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यह सभी वर्गों के पुरुषों के लिये अत्यंत उत्तम स्वास्थ्यवर्धक वटी ( टैबलेट) है जो कि बेहद प्रभावी तथा बहुमूल्य जड़ी-बूटियों का बेहतरीन मिश्रण करके बनाई गयी है। इसमें शुद्ध शिलाजीत, मकरध्वज, बंग भस्म, अभ्रक भस्म २०० पुटी, जायफल, लवंग, कर्पूर, इलायची, अश्वगंधा, शुद्ध व उच्च कोटि के काश्मीरी केसर(ज़ाफ़रान) का योग दुर्लभ व बिजली जैसी ताकत प्रदान करने वाला महाशक्तिशाली योग है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को जिन चमत्कारिक औषधियों के कारण संसार भर में जाना व सम्मान करा जाता है उनमें से शिलाजीत तथा मकरध्वज प्रमुख हैं। इन्हीं अनुपम रसायनों के मिश्रण से इस महौषधि को तैयार करा गया है। इनके अतिरिक्त जिन औषधियों का व्यवहार इसमें करा गया है वे भी अत्यंत प्रभावशाली व असरकारक हैं। इस योग के प्रभाव से वीर्य संबंधी सारे विकारों एवं रोगों में आश्चर्यजनक लाभ होता है। ये जादुई असर समेटे गोलियां भोजन को पचाकर रस आदि शरीर की सप्त धातुओं को क्रमशः सुधारती हुई देह की अंतिम धातु "वीर्य" का शुद्ध स्थिति में निर्माण करती हैं जिससे कि शरीर में नवजीवन व स्फूर्ति का संचार होता है। जो व्यक्ति शिलाजीत और मकरध्वज के गुणों के बारे में जानते हैं वे इस औषधि के प्रभाव के बारे में जरा भी संदेह नहीं कर सकते हैं। ये अनुपान भेद(दवा लेने के तरीके से यानि दूध, शहद, पानी, मलाई, मक्खन आदि) से अनेक रोगों को तत्काल दूर करने में सहायक हैं। प्रमेह के साथ होने वाली खांसी, सर्दी, जुकाम, कमर दर्द, भूख की एकदम कमी, स्मरण शक्ति यानि याददाश्त की कमी जैसी व्याधियां इस महौषधि के सेवन से दूर हो जाती हैं। इसके सेवन से शरीर पुष्ट हो जाता है साथ ही भूख लगने लगती है व पाचन सही तरीके से होने लगता है। इस प्रकार जो व्यक्ति अनेक औषधियां लगातार सेवन कर करके दवाओं का गोदाम बन गये हैं वे सभी बाजारू दवाएं छोड़ कर यदि मात्र इसी दवा का सर्दियों से मौसम में नियमित रूप से सेवन कर लें तो किसी दूसरी दवा की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है। चढ़ती जवानी में जब शरीर में हारमोनल परिवर्तन होते हैं यानि कि बचपन से जवानी में इन्सान कदम रखता है तो जब शरीर में वीर्य का प्रत्यक्ष प्रादुर्भाव होता है तो मानव देह में वह ताकत है जो कि शरीर में एक नए निर्माण की क्षमता पैदा करती है तो उसे सम्हाल पाना एक कठिन कार्य होता है जो कि सभी के वश में नहीं होता इसी कारण यह महाशक्ति हस्तमैथुन आदि के द्वारा देह से बाहर निकल जाती है। जब पारिवारिक जीवन को सही ढंग से चलाने के लिये उस वीर्य रूपी महाशक्ति की आवश्यकता पड़ती है तब तक खजाना खाली हो चुका होता है यानि जवानी आते-आते ही अच्छे-खासे जवान के चेहरे की रौनक और चमक गायब हो जाती है, संभोग के समय वीर्य संबंधी परेशानियां मुंह फाड़ कर सुरसा की भांति खड़ी हो जाती हैं और वैवाहिक जीवन का सत्यानाश हो जाता है। उम्र बढ़ने पर देह में निर्बलता का आना एक सहज सी प्रक्रिया है जो कि मेटाबालिक क्रियाओं के फलस्वरूप होता है और रोग प्रतिरोध क्षमता कम होने लगती है किन्तु यह महौषधि उस लुप्त होती शक्ति को पुनः उत्तेजित कर मनुष्य को सबल और निरोगी बनाए रखती है।इस महौषधि को अनेक समस्याओं में प्रयोग करा जा सकता है जैसे कि स्वप्न दोष(Night fall)या रात्रि में सोते समय अपने आप ही अंडकोश के स्राव का निकल जाने पर इसे सुबह-शाम दो गोली गुनगुने गर्म दूध में मिश्री(खड़ी साखर) मिला कर लेने से कुछ समय में यह रोग जड़ से समाप्त हो जाता है। शीघ्रपतन(Premature ejaculation) यानि संभोग काल में बहुत जल्दी ही बिना संतुष्टि हुए वीर्य का निकल जाने पर इस महौषधि की दो गोली को रूमी मस्तंगी एक रत्ती(१२५ मिलीग्राम) + छह रत्ती सफेद मूसली के साथ गुठली निकाले छुहारे के बीच रख कर चबा लें और ऊपर से मिश्री मिला गुनगुना गर्म दूध पिएं तो मात्र कुछ ही समय में चमत्कार हो जाता है और निर्बल सा महसूस करने वाला रोगी बलिष्ठ बन जाता है।इसी प्रकार इस महान औषधि को अपने वैद्यजी या डाक्टर की सलाह से तमाम रोगों में प्रयोग करके एक नया ऊर्जा से भरा जीवन जी सकते हैं। यदि स्वस्थ व्यक्ति भी एक-एक गोली दूध के साथ रोजाना ले तो एक अत्युत्तम सर्वश्रेष्ठ अनुपम टानिक की तरह से यह औषधि कार्य करती है।

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पुरुषो को होने वाले रोगों की आयुर्वेदिक औषधि 
जानिए पुरुषो के रोगों के इलाज में उपलब्ध आयुर्वेदिक औषधियों के बारे में | साथ ही यह जानिए की इन औषधियों का सेवन कैसे करें और क्या परहेज रखें |
इस लेख में निम्नलिखित बीमारियों के लिए आयुर्वेदिक औषधियां बताई गई है |
पुरुष बांझपन 
पेशाब में जलन 
पथरी, किडनी स्टोन
किडनी रोग
नपुंसकता 
सफेद पानी 
थैलेसीमिया 
पुरुषो के विभिन्न रोगों के इलाज 
आयुर्वेद में मूत्रक्कृच्छ्, पेशाब में जलन ( Dysuria ) का इलाज-
गोक्षुरादि गुग्गुलु – 60 ग्राम चन्द्रप्रभावटी – 40 ग्राम गिलोयघन वटी – 60 ग्राम 1-1 गोली दिन में 3 बार प्रात: नाश्ते, दोपहर-भोजन एवं सायं भोजन के आधे घण्टे बाद सुखोष्ण (गुनगुने) जल से सेवन करें।
चन्दनासव – 450 मिली 4 चम्मच औषध में 4 चम्मच पानी मिलाकर प्रात: एवं सायं भोजन के बाद सेवन करें।
(Urolythiasis/ Stone in Bladder) पथरी, किडनी स्टोन का इलाज-
अश्मरीहर क्वाथ – 300 ग्राम 1 चम्मच औषधि को 400 मिली पानी में पकाएं और जब 100 मिली शेष रहने पर छानकर प्रात: सायं खाली पेट पिएं।
अश्मरीहर रस – 50 ग्राम 1-1 ग्राम औषधि को अश्मरीहर क्वाथ के साथ सेवन कराएं। गोक्षुरादि गुग्गुलु – 60 ग्राम चन्द्रप्रभा वटी – 60 ग्राम 1-1 गोली प्रात: व सायं भोजन के बाद सुखोष्ण (गुनगुने) जल से सेवन करें। नोट– पत्थरचट्टे का पत्ता रोज प्रात: खाली पेट चबाकर खाए।
किडनी, वृक्क की निष्क्रियता (CRF) एवं किडनी रोग का इलाज-
सर्वकल्प क्वाथ – 100 ग्राम + वृक्कदोषहर क्वाथ – 200 ग्राम + नीम छाल – 5 ग्राम + पीपल छाल 5 ग्राम सभी औषधियों को मिलाकर 1 चम्मच (लगभग 5–7 ग्राम) की मात्रा में लेकर 400 मिली पानी में पकाएं और 100 मिली शेष रहने पर छानकर प्रात:, सायं खाली पेट पियें।
गिलोयघन वटी – 60 ग्राम 2–2 गोली प्रात: व सायं खाली पेट सुखोष्ण (गुनगुने) जल से सेवन करें।
वसन्तकुसुमाकर रस – 1 ग्राम + गिलोय सत् -10 ग्राम + हजरुल यहूद भस्म – 10 ग्राम + पुनर्नवादि मण्डूर – 20 ग्राम + शवेत पर्पष्टी – 5 ग्राम सभी औषधियों को मिलाकर 60 पुड़ियां बनाएं। प्रात: नाश्ते एवं रात्रि-भोजन से आधा घण्टा पहले जल/शहद से सेवन करें।

गोक्षुरादि गुग्गुलु – 60 ग्राम चन्द्रप्रभा वटी – 60 ग्राम वृक्कदोषहर वटी – 60 ग्राम 1–1 गोली दिन में 2-3 बार प्रात: नाश्ते, दोपहर-भोजन एवं सायं भोजन के आधे – घण्टे बाद गुनगुने जल से सेवन करें।
नोट- उच्चरक्तचाप होने की स्थिति में मुक्तावटी की 1-1 या 2-2 गोली प्रात: एवं सायं खाली पेट पानी या काढ़े से लें।
नपुंसकता, शुक्राल्पता (Oligospermia , fertility ) नामर्दी का इलाज-
वसन्तकुसुमाकर रस – 1-3 ग्राम + त्रिवंगा भस्म – 5 ग्राम + अभ्रकं भस्म – 10 ग्राम + गिलोय सत् – 10 ग्राम + सिद्ध मकरध्वज – 2 ग्राम + प्रवाल पिष्टी – 10 ग्राम सभी औषधियों को मिलाकर 60 पुड़िया बनाएं। प्रात: नाश्ते एवं रात्रि-भोजन से आधा घण्टा पहले जल/शहद से सेवन करें।
शिलाजीत सत् – 20 ग्राम 2-2- बूँद दूध में मिलाकर सेवन करें।
यौवनामृत वटी – 5 ग्राम ,चन्द्रप्रभावटी- 40 ग्राम 2–2 गोली प्रात: व सायं भोजन के बाद दूध से सेवन करें।
अश्वगन्धा चूर्ण – 100 ग्राम, शतावरी चूर्ण – 100 ग्राम, श्वेतमूसली चूर्ण – 100 ग्राम
1- 1 चम्मच चूर्ण को प्रात: एवं सायं भोजन के बाद गुनगुने जल के साथ सेवन करें।
शुक्राल्पता में उपरोक्त औषधियों के साथ -कौंच, बीज – 250 ग्राम+ सफेद गुञ्जा – 250 ग्राम कौंच बीज तथा सफेद गुज्जा को कुटकर 1-1 चम्मच की मात्रा में प्रात: एवं सायं । दूध के साथ सेवन करने पर शुक्राणुओं की वृद्धि तथा शरीर का पोषण होता है। (कौंच बीज तथा सफेद गुञ्जा का प्रयोग शोधन के पश्चात् ही करना चाहिए । इसका शोधन दोला यन्त्र विधि से किया जाता है। बीजों को 1 पोटली में लटकाकर 4 ली दूध में पकाएं, जब पकते-पकते दूध गाढ़ा हो जाए तो पोटली को निकालकर, छिलका उतारकर बीजों को पीसकर कर सुरक्षित रख लें।
शुक्राणुहीनता, पुरुष बांझपन ( Azoospermia ) का इलाज-
हीरक भस्म – 300 मि.ग्राम + वसन्तकुसुमाकर रस – 2-3 ग्राम + दिव्य सिद्धमकरध्वज – 2–3 ग्राम सभी औषधियों को मिलाकर 60 पुड़ियां बनाएं। प्रात: नाश्ते एवं रात्रि-भोजन से आधा घण्टा पहले जल/शहद से सेवन करें।
प्रमेह तथा शुक्रमेह, धातु गिरना  और सफेद पानी का इलाज-
सर्वकल्प क्वाथ – 100 ग्राम+ वृक्कदोषहर क्वाथ – 200 ग्राम , दोनों औषधियों को मिलाकर 1 चम्मच (लगभग 5-7 ग्राम) की मात्रा में लेकर 400 मिली पानी में पकाएं और 100 मिली शेष रहने पर छानकर प्रात:, सायं खाली पेट पिएं।
गिलोयघन वटी – 60 ग्राम 2-2 गोली उपरोक्त क्वाथ से सेवन करें।
आंवला चूर्ण – 100 ग्राम +वंगभस्म – 5 ग्राम +प्रवाल पंचामृत – 5 ग्राम +हजरुल यहूद भस्म – 5 ग्राम + गिलोय सत् – 20 ग्राम सभी औषधियों को मिलाकर 1-1 चम्मच प्रात:, नाश्ते एवं रात्रि-भोजन से आधा घण्टा पहले जल/शहद से सेवन करें।
गोक्षुरादि गुग्गुलु – 60 ग्राम , चन्द्रप्रभावटी – 60 ग्राम, शिलाजीत रसायन वटी – 60 ग्राम 1-1 गोली दिन में 3 बार प्रात: नाश्ते, दोपहर-भोजन एवं सायं भोजन के आधे घण्टे बाद जल से सेवन करें।
अन्य व्याधिष्य थैलेसीमिया (Thalessemia) का इलाज-
सर्वकल्प क्वाथ – 300 ग्राम 1 चम्मच औषध को 400 मिली पानी में पकाएं और 100 मिली शेष रहने पर छानकर प्रात:, सायं खाली पेट पिएं। कुमारकल्याण रस – 1-2 ग्राम+ प्रवाल पिष्टी – 5 ग्राम +कहरवा पिष्टी – 5 ग्राम + मुक्ता पिष्टी – 5 ग्राम +गिलोयसत् – 10 ग्राम + प्रवालपंचामृत – 5 ग्राम सभी औषधियों को मिलाकर 60 पुड़ियां बनाएं। प्रात: नाश्ते एवं रात्रि-भोजन से आधा घण्टा पहले जल/शहद से सेवन करें।
कैशोर गुग्गुल – 40 ग्राम + आरोग्यवर्धिनी वटी – 20 ग्राम 1–1 गोली प्रात: व सायं भोजन के बाद गुनगुने जल से सेवन करें। धृतकुमारी स्वरस – 10 मिली + गिलोय स्वरस – 10 मिली इसमें (उपरोक्त दोनों स्वरसों में) गेंहूँ के ज्वारे का रस मिलाकर प्रात: एवं सायं खाली पेट सेवन करें।
Disclaimer – यह जानकारी केवल आपके ज्ञान वर्धन और जागरूकता के लिए है | इसे बताने का औचित्य सिर्फ आपको इस बारे में जागरूक बनाना है | बिना चिकित्सक के परामर्श के दवाइयों का सेवन नहीं करना चाहिए | Never Take Medicines without Consulting the Doctor.
नमस्कार दोस्तों एकबार फिर से आपका Ayurvedic Upchar में स्वागत है आज हम आपको ऐसी औषध के बारे में बताएँगे जो शरीर के अँगो को पुनः नया जीवन दे सकती है, जो कैन्सर के मरीज़ों के लिए आयुर्वेद जगत की संजीवनी है जिसका नाम पुनर्नवा है। पुर्ननवा संस्कृत के दो शब्द पुनः अर्थात ‘फिर’ और नव अर्थात ‘नया’ से बना है। पुर्ननवा औषधि में भी अपने नाम के अनुरूप ही शरीर को पुनः नया कर देने वाले गुण पाए जाता है। इसलिए इसे रोगों से लड़ने से लेकर कैंसर के इलाज तक में उपयोग किया जाता है।
इसकी 1 चम्मच भोजन के साथ अर्थात सब्जी में मिलाकर सेवन करने से बुढापा नही आता अर्थात बूढ़ा व्यक्ति भी जवाँ बना रहता है क्योंकि इससे शरीर के सभी अंग का पुनः नयी कोशिका का निर्माण होता रहता है। "शरीर पुनर्नवं करोति इति पुनर्नवा" जो अपने रक्तवर्धक एवं रसायन गुणों द्वारा सम्पूर्ण शरीर को अभिनव स्वरूप प्रदान करे, वह है ‘पुनर्नवा’। यह हिन्दी में साटी, साँठ, गदहपुरना, विषखपरा, गुजराती में साटोड़ी, मराठी में घेटुली तथा अंग्रेजी में ‘हॉगवीड’ नाम से जानी जाती है।
मूँग या चने की दाल मिलाकर इसकी बढ़िया सब्जी बनती है, जो शरीर की सूजन, मूत्ररोगों (विशेषकर मूत्राल्पता), हृदयरोगों, दमा, शरीरदर्द, मंदाग्नि, उलटी, पीलिया, रक्ताल्पता, यकृत व प्लीहा के विकारों, बुढ़ापे को रोकता है, जवाँ बनाएंआदि में फायदेमंद है। इसके ताजे पत्तों के 15-20 मि.ली. रस में चुटकी भर काली मिर्च व थोड़ा-सा शहद मिलाकर पीना भी हितावह है । भारत में यह सब्जी सर्वत्र पायी जाती है।
पुनर्नवा का शरीर पर होने वाला रसायन कार्य :
दूध, अश्वगंधा आदि रसायन द्रव्य रक्त-मांसादि को बढ़ाकर शरीर का बलवर्धन करते हैं परंतु पुनर्नवा शरीर में संचित मलों को मल-मूत्रादि द्वारा बाहर निकालकर शरीर के पोषण का मार्ग खुला कर देती है ।बुढ़ापे में शरीर में संचित मलों का उत्सर्जन यथोचित नहीं होता । पुनर्नवा अवरूद्ध मल को हटाकर हृदय, नाभि, सिर, स्नायु, आँतों व रक्तवाहिनियों को शुद्ध करती है, जिससे मधुमेह, हृदयरोग, दमा, उच्च रक्तदाब आदि बुढ़ापे में होनेवाले कष्टदायक रोग उत्पन्न नहीं होते। यह हृदय की क्रिया में सुधार लाकर हृदय का बल बढ़ाती है । पाचकाग्नि को बढ़ाकर रक्तवृद्धि करती है । विरूद्ध आहार व अंग्रेजी दवाओं के अतिशय सेवन से शरीर में संचित हुए विषैले द्रव्यों का निष्कासन कर रोगों से रक्षा करती है।

बाल रोगों में लाभकारी पुनर्नवा शरबत :
पुनर्नवा के पत्तों के 100 ग्राम स्वरस में मिश्री चूर्ण 200 ग्राम व पिप्पली (पीपर) चूर्ण 12 ग्राम मिलाकर पकायें तथा चाशनी गाढ़ी हो जाने पर उसको उतार के छानकर शीशी में रख लें । इस शरबत को 4 से 10 बूँद की मात्रा में (आयु अनुसार) रोगी बालक को दिन में तीन-चार बार चटायें । खाँसी, श्वास, फेपडों के विकार, बहुत लार बहना, जिगर बढ़ जाना, सर्दी-जुकाम, हरे-पीले दस्त, उलटी तथा बच्चों की अन्य बीमारियों में बाल-विकारशामक औषधि कल्प के रूप में इसका उपयोग बहुत लाभप्रद है ।

पुनर्नवा के 25 चमत्कारी फायदे :

  1. पुनर्नवा रक्तशोधन में उपयोग किया जाता है। यह रक्त से विषैले पदार्थों को दूर कर कई रोगों को नष्ट कर देता है।
  2. पुनर्नवा का उपयोग जोड़ों के दर्द से निजात दिलाता है। यह किसी भी तरह के आर्थराइटिस में उपयोगी साबित होता है।
  3. पुनर्नवा शरीर को ऊर्जा देता है। यह मांसपेशियों को मज़बूत कर कमज़ोरी और दुबलापन दूर करता है।
  4. पुनर्नवा पेट से जुडी बीमारियों को दूर करता है। आँतों में ऐठन, अपच और पेट में ज़रूरी अम्लों की कमी जैसे रोगों में यह जल्द आराम दिलाता है।
  5.  किसी भी तरह के चर्मरोग जैसे दाग, धब्बे, छाई , चोट के निशान आदि पर पुनर्नवा के जड़ को पीस कर लेप बनाकर लगाएं। कुछ ही दिनों में आप रोग को दूर होता पाएंगे।
  6. पुनर्नवा उपयुक्त वज़न बनाये रखने में मदद करता है। यह अतरिक्त वसा कम करता है तथा दुबलेपन को भी दूर करता है।
  7. पुनर्नवा का नियमित सेवन मूत्रप्रवाह को सुचारू कर शरीर को स्वस्थ और स्वच्छरखता है। यह कोशिकाओं में तरल पदार्थ के प्रवाह को भी बेहतर करता है।
  8. ये कैन्सर के मरीज़ों के लिए आयुर्वेद जगत की सबसे अद्भुत औषधि है क्यूँकि ये नयी कोशिकाएँ बनाती है। ये नयी कोशिकाएँ कैन्सर से लड़ने में शक्ति प्रदान करती है। 
  9. पैरालिसिस, शरीर के किसी विशेष हिस्से का सुन्न पड़ना और मांसपेशियों में कमज़ोरी आना जैसी समस्याएं भी पुनर्नवा के सेवन से दूर होती है।
  10. नेत्रों की फूलीः पुनर्नवा की जड़ को घी में घिसकर आँखों में आँजें।
  11. नेत्रों की खुजलीः पुनर्नवा की जड़ को शहद या दूध में घिसकर आँख में आँजें।
  12. नेत्रों से पानी गिरनाः पुनर्नवा की जड़ को शरहद में घिसकर आँखों में आँजें।
  13. पेट के रोगः गोमूत्र एवं पुनर्नवा का रस समान मात्रा में मिलाकर पीयें।
  14. पेट की गैसः 2 ग्राम पुनर्नवा के मूल का चूर्ण, आधा ग्राम हींग व 1 ग्राम काला नमक गर्म पानी से लें।
  15. मूत्रावरोधः पुनर्नवा का 40 मि.ली. रस अथवा उतना ही काढ़ा पीयें पुनर्नवा के पत्ते बाफकर पेडू पर बाँधें । 1 ग्राम पुनर्नवाक्षार (आयुर्वेदिक औषधियों की दुकान से मिलेगा) गर्म पानी के साथ पीने से तुरंत फायदा होता है।
  16. पथरीः पुनर्नवा की जड़ को दूध में उबालकर सुबह-शाम पीयें । 6. सूजनः पुनर्नवा की जड़ का काढ़ा पिलाने एवं सूजन पर जड़ को पीसकर लेप करने से लाभ होता है।
  17. पीलियाः पुनर्नवा के पंचांग (जड़, छाल, पत्ती, फूल और बीज) को शहद एवं मिश्री के साथ लें अथवा उसका रस या काढ़ा पीयें।
  18. पागल कुत्ते का विषः सफेद पुनर्नवा के मूल का 25 से 50 ग्राम घी में मिलाकर रोज पीयें।
  19. फोड़ाः पुनर्नवा के मूल का काढ़ा पीने से कच्चा अथवा पका हुआ फोड़ा भी मिट जाता है।
  20. अनिद्राः पुनर्नवा के मूल का 100 मि.ली. काढ़ा दिन में 2 बार पीयें।
  21. संधिवातः पुनर्नवा के पत्तों की सब्जी सोंठ डालकर खायें।
  22. एड़ी में वायुजन्य वेदना होती हो तो ‘पुनर्नवा तेल’ एड़ी पर घिसें व सेंक करें।
  23. खूनी बवासीरः पुनर्नवा के मूल को पीसकर फीकी छाछ (200 मि.ली.) या बकरी के दूध (200 मि.ली.) के साथ पीयें।
  24. हृदयरोगः हृदयरोग के कारण सर्वांग सूजन हो गयी तो पुनर्नवा के मूल का 10 ग्राम चूर्ण और अर्जुन की छाल का 10 ग्राम चूर्ण 200 मि.ली. पानी में काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीयें।
  25. दमाः 10 ग्राम भारंगमूल चूर्ण और 10 ग्राम पुनर्नवा चूर्ण को 300 मि.ली. पानी में उबालकर काढ़ा बनायें । 50 मि.ली. बचे तब सुबह-शाम पीयें।
 लवण भास्कर चूर्ण
आयुर्वेद में लवण भास्कर चूर्ण खाने को पचाने में एक बेहतरीन योग मना जाता है इसे सर्वप्रथम आचार्य भास्कर ने बनाया था. आयुर्वेद को अनेक संज्ञाएँ दी जाती है जैसेकि आयुर्वेद को जीवन का वेद माना जाता है क्योकि ये व्यक्ति को निरोगी रखने के योगों से भरा हुआ है, साथ ही आयुर्वेद हमे हमेशा ये शिक्षा देता है कि निरोगी कैसे रहा जाएँ और अगर कभी कोई रोग शरीर को शिकार बना भी ले तो उसे दूर कैसे किया जाए. आयुर्वेदिक उपचारों की सबसेख़ास बात ये होती है कि उनसे किसी तरह का साइड इफ़ेक्ट नहीं होता. आज आपको एक ऐसे ही आयुवेदिक औषधि से परिचित कराने जा रहे है जो स्वास्थ्य और पाचन तंत्र के लिए काफी लाभदायी  है, जिसे लवण भास्कर चूर्ण के नाम से भी जाना जाता हैं ! इसे आप अपने घर में भी बना सकते हैं अगर आपको आयुर्वेद का ज्ञान हो

लवण भास्कर चूर्ण की खासियत ( Importance of Lavan Bhaskar Churn ) :
इसकी सबसे ख़ास बात ये है कि ये निरापद  है जिसे 1 से 3 ग्राम की मात्रा में लेने पर व्यक्ति की सभी पेट सम्बन्धी समस्याएं दूर हो जाती है. इस औषधि का प्रयोग काँजी, पानी और दही के साथ लिया जाता है किन्तु मट्ठा के साथ लेने पर इसका सर्वाधिक लाभ मिलता है.

लवण भास्कर चूर्ण कैसे करे इस्तेमाल ?
अगर इस चूर्ण को रात के समय गर्म पानी के साथ लिया जाए तो खुलकर शौच आता है, जिससे कब्ज में राहत मिलती है. वहीँ अगर इस चूर्ण में समान मात्रा में पंचसकार चूर्ण मिलाकर प्रयोग किया जाए तो ये दस्त तक लगा देता है जिससे दिन में 3 से 4 बार दस्त आते है और पेट पूरी तरह साफ़ हो जाता है.
इसका सेवन त्वचा सम्बन्धी सभी रोगों से निजात पाने और आम वात रोगों को दूर करने के लिए भी होता है इसके  बेनिफिट्स. भूख बढाने, पेट की वायु को बाहर निकलने, डकार इत्यादि में भी इस चूर्ण का इस्तेमाल फायदेमंद रहता है.

तो आइये जाने इसके बनाने की बिधि एवं सामग्री 
कैसे बनाएं लवण भास्कर चूर्ण ( How to Prepare Lavan Bhaskar Churn ) :
  • - 96 ग्राम : समुद्री नमक
  • - 48 ग्राम : अनार दाना
  • - 24 ग्राम : विडनमक
  • - 24 ग्राम : सेंधा नमक
  • - 24 ग्राम : पीपल
  • - 24 ग्राम : काला जीरा
  • - 24 ग्राम : पिपलामुल
  • - 24 ग्राम : तेजपत्ता
  • - 24 ग्राम : तालीस पत्र
  • - 24 ग्राम : नागकेशर
  • - 24 ग्राम : अम्लवेत
  • - 12 ग्राम : जीरा
  • - 12 ग्राम : काली मिर्च
  • - 12 ग्राम : सौंठ
  • - 06 ग्राम : इलायची
  • - 06 ग्राम : दालचीनी
घर पर बनायें लवण भास्कर पाउडर
सबसे पहली बात तो ये कि उपरलिखित सारी सामग्री किसी भी पंसारी के पास आसानी से मिल जायेगी. इनसे चूर्ण बनाने के लिए आप सबसे पहले सभी सामग्री को छान लें और उसमें नीम्बू का रस मिलाएं. अब इस मिश्रण को छाया में सुखाएं, इस प्रक्रिया को भावना देना भी कहा जाता है. बस इतना मात्र करने से ही आपका लवण भास्कर चूर्ण तैयार हो जाता है.

सावधानिया ( Cautions ) : इस चूर्ण को लेते वक़्त आपको ध्यान रखना है कि उच्च रक्तचाप रोगी और गुर्दे के रोगों से परेशान व्यक्ति इसका सेवन ना करें. डॉक्टर के सलाह से ही सेवन करे

नोट : कोई भी व्यक्ति आयुर्वेदिक औषधि बिना डॉक्टर के परामर्श के न ले ! क्योकि हर केस में मरीज़ के लक्षण अलग अलग होते हैं जिसका साइड इफ़ेक्ट भी हो सकता हैं – अगर आपको चिकिसकीय परामर्श चाहिए तो संपर्क करे ! आप हमे कॉल कर सकते हैं ! हमारा नंबर हैं - +91-8744808450, Whatsapp- +91 9911686262
कील-मुंहासे प्रत्येक किशोर या किशोरी को अनिवार्य रूप से होते ही हैं, ऐसा नहीं है। जिनको होते हैं, वे मानसिक रूप से दुःखी-पीड़ित होते हैं और समझ नहीं पाते कि ये कील-मुंहासे क्यों निकल रहे हैं और इनको कैसे ठीक किया जा सकता है। 

कारण : तेज मसालेदार, तले हुए, उष्ण प्रकृति वाले पदार्थों का अधिक सेवन करने, रात को देर तक जागने, सुबह देर तक सोए रहने, देर से शौच व स्नान करने, शाम को शौच न जाने, निरंतर कब्ज बनी रहने, कामुक विचार करने, ईर्षा व क्रोध करने, स्वभाव में गर्मी व चिड़चिड़ापन रखने आदि कारणों से शरीर में ऊष्णता बढ़ती है और तैलीय वसा के स्राव में रुकावट पैदा होती है, जिससे कील-मुंहासे निकलने लगते हैं।


सावधानी हलका, सुपाच्य और सादा आहार पथ्य है, अधिक शाक-सब्जी का सेवन करना, अधिक पानी पीना, शीतल व तरावट वाले पदार्थों का सेवन करना पथ्य है। तेज मिर्च-मसालेदार, तले हुए, मांसाहारी पदार्थों तथा मादक द्रव्यों का सेवन करना अपथ्य है। 

आप निम्न औषधियां नियमित रूप से तीन माह तक लीजिये-
1. गंधक रसायन १०० मिग्रा.+रस माणिक्य १०० मिग्रा.+ गिलोय सत्व २०० मिग्राइन्हें घोंट कर एक कर लें तथा दिन में तीन बार खदिरारिष्ट + महामंजिष्ठादि काढ़े के दो चम्मच के साथ सेवन करें।
2. त्रिफला चूर्ण दो चम्मच दिन में दो बार गुनगुने जल के साथ सेवन करें।
3. यदि चाहें तो सोमराजी तेल रात में सोते समय हलके हाथ से प्रभावित अंग पर लगा लिया करें।

4.गाय के ताजे दूध में एक चम्मच चिरौंजी पीसकर इसका लेप चेहरे पर लगाकर मसलें। सूख जाने पर पानी से धो डालें।
5.सोहागा 3 ग्राम, चमेली का शुद्ध तेल 1 चम्मच। दोनों को मिलाकर रात को सोते समय चेहरे पर लगाकर मसलें। सुबह बेसन को पानी से गीला कर गाढ़ा-गाढ़ा चेहरे पर लगाकर मसलें और पानी से चेहरा धो डालें।

नोट – किसी भी आयुर्वेद औषधि का सेवन करने से पहले आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श अवश्य ले जिससे आपको हानि होने की सम्भावना नही रहेगी |

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ह्रदय रोग क्या है-मनुष्य का हृदय एक मिनट में 72 बार धड़कता है यानि हमारा हृदय एक बार में 72 बार रक्त पंप करता है जिस से हमारे शरीर के हर अंग में धमनियों के जरिये रक्त पहुँचता है और रक्त हमारे पूरे शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा को पूरा करता है और जैसे आप जानते ही हैं कि किसी भी जीव का ज़िंदा रहने के लिए ऑक्सीजन जरूरी होता है। धूम्रपान ,मदिरापान करने या हाई ब्लड प्रेसर ,अधिक चर्बी,ज्यादा कोलेस्ट्रॉल या मोटापा  के कारण धमनियों में कोलेस्ट्रॉल के थक्के जम जाते है और रक्त प्रवाह का रास्ता (धमनियां ) ब्लॉक हो जाती हैं जिस से ब्लड शरीर में  प्रोपरली सप्लाई नही हो पाता है और न ही हृदय तक ! इसी वजह से  हार्ट अटेक जैसी बीमाइयो का खतरा बढ़ जाता है और पल भर में किसी की ज़िन्दगी ख़त्म हो जाती है और भारत में हृदय रोगियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। 

ह्रदय रोग के लक्षण- 
  1. अचानक  ऐसा लगता है जैसी किसी ने छाती पर जोर से चोट मार दी हो और हृदय में दर्द होने लगता है और रोगी लाचार होकर गिर जाता है तड़पने लगता है। 
  2. कभी कभी छाती में एक जकड़न सी महसूस होती है मनो किसी ने छाती को जकड़ लिया हो इसे एनजाइन कहते हैं । 
  3. किसी कार्य को करते वक़्त ,अचानक सीने में दर्द होना। 
  4. नींद कम आती है , घबराहट होती है ,यह भी हृदय रोग का संकेत हो सकता है। 
  5. हाथों, कमर, गर्दन, जबड़े या फिर पेट में दर्द और बेचैनी महसूस हो सकती है
  6. चक्कर आते रहते हैं,दिल बहुत तेजी से धड़कता रहता है।
  7. भूख एकदम कम लगती है,आंखों में कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि गर्म धुंआ सा निकल रहा है। 


हृदय  रोग आयुर्वेदिक उपचार-

  1. (अर्जुन की छाल का चूर्ण ६० ग्राम + स्वर्णमाक्षिक भस्म १० ग्राम + अकीक पिष्टी १० ग्राम + मुक्ताशुक्ति पिष्टी १० ग्राम + शुद्ध सूखा शिलाजीत १० ग्राम + जहरमोहरा खताई पिष्टी १० ग्राम + लोह भस्म १० ग्राम ) इन सब को मिला कर कस कर घोंट लीजिये और ५०० मिलीग्राम की पुड़ियां बना लें जो कि आपके लिये एक खुराक होगी। इस दवा को एक-एक पुड़िया दिन में तीन बार अर्जुनारिष्ट के दो चम्मच के साथ लीजिये। दवा खाली पेट न लें।
  2. अर्जुन घृत एक-चौथाई चाय का चम्मच दिन में दो बार सुबह-शाम लीजिये। आप मात्र दो माह लगातार औषधियां ले लीजिये आजीवन आपको दिल की कोई तकलीफ़ उम्मीद है कि होगी ही नहीं।

हृदय  रोग का घरेलू उपचार-

  1. हृदय रोग का उपचार बुखार या सर्दी जैसे नहीं है जो कुछ ही दिनों में ठीक हो जाये क्योंकि यह आपके शरीर के आन्तिरिक और बाहरी गतिविधियों पर निर्भर करता है जैसा आप अपने शरीर को ढालेंगे वैसा ही हो जायेगा तो कुछ नुस्खे है जो आपको बता रहे हैं।
  2. लहसुन-लहसुन कई रोगों को दूर करता है इसमें यह हृदय रोगी  के लिए भी फायदेमंद होता है क्योंकि इसमें ऐसे तत्व होते हैं जो कोलेस्ट्रॉल को कम करने और खून को पतला बनाने में मदद करता है। मगर ध्यान रहे आवश्यकता से अधिक लहसुन लेना भी ठीक नहीं होगा। 
  3. अंगूर-अंगूर भी हृदय रोगियों के लिए बहुत अच्छा फल है अंगूर का जूस पियें अंगूर खाये  इस से  वजन भी कम होता है और हृदय रोग होने के एक कारण  मोटापा भी है इसलिए अंगूर का सेवन करें।
  4. ग्रीन टी-ग्रीन टी  आपको आसानी से मिल जाएगी यह भी मोटापा घटाने में सहायता करती है और साथ ही साथ कोलेस्ट्रॉल भी काम करता है। 
  5. अनार-अनार का रस तो हमेशा सेहत के लिए फायदेमंद ही है  और एक शोध में वैज्ञानिको ने पता लगाया की अनार एंटीऑक्सीडेंट और अथेरोस्क्लेरोसिस और लोव ब्लड प्रेस्सेर में मदद करता है। 
  6. लाल मिर्च- एंटीऑ लाल मिर्च में एक कैप्साइसिन नाम का तत्व रहता है जो रक्त वाहिकाओं के लोच में सुधार करता है और वाहिकाओं को स्वस्थ रखता है और साथ ही साथ या रक्त में कोलोस्ट्रोल के कारन थक्का जमने  की सम्भावना को काम कर देता है और कोलेस्ट्रॉल को काम करता है।
  7. हल्दी-  है और वाहिकाओं हल्दी में भी एंटीऑक्सीडेंट और अथेरोस्क्लेरोसिस तत्व पाए जाते हैं जो थक्का नहीं जमने देता और हृदय को स्वस्थ बनाए रखता है। साथ ही साथ एलडीएल को भी काम करने में मदद करता है। 

अपेंडिक्स अर्थात आंत्रपुच्छ शोथ (अपेण्डिसाइटिस) का इलाज-
आज हम आपको बताने जा रहे हैं अपेण्डिसाइटिस का ऐसा रामबाण इलाज जिससे अगर डॉक्टर ने आपको ऑपरेशन की सलाह भी दे दी हैं तो भी ऑपरेशन की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
यहाँ पर बताये गए तीनो प्रयोग अपेण्डिसाइटिस के लिए रामबाण हैं। भारतीय आयुर्वेद ज्ञान का हिस्सा हैं और पुराने वैदो द्वारा सफलता पूर्वक आजमाए हुए हैं। आइये जाने ये प्रयोग-
1. ऐसी जगह जहाँ देसी गाय चरती हो या रहती हो वहां की मिटटी (अगर ऐसी जगह ना हो तो ऐसे खेत की मिटटी जहाँ पर केमिकल्स युक्त खाद इस्तेमाल ना होते हो उस खेत की मिटटी) भिगोकर अपेण्डिसाइटिस से प्रभावित हिस्से पर रखे तथा थोड़ी थोड़ी देर में बदलते रहे एवं तीन दिन तक निराहार रहे। चौथे दिन आधी कटोरी मूंग का पानी, पांचवे दिन एक कटोरी, छठे दिन एक कटोरी मूंग व् सातवे दिन भूख के अनुसार मूंग खाए। आठवे दिन मूंग और चावल का आहार ले तथा नौवे दिन सब्जी रोटी खाना प्रारम्भ करे। इससे अपेंडिक्स मिट जायेगा व् जीवन में फिर कभी नहीं होगा।

2. हर रोज़ सुबह नित्य कर्म से निर्व्रत हो कर (शौच वगैरह जा कर) पांच मिनट तक प्रतिदिन पादपश्चिमोत्तानासन करने से कुछ ही दिनों में अपेंडिक्स मिटता हैं।
3. भोजन से पहले अदरक, निम्बू एवं सेंधा नमक खाने से अपेंडिक्स में लाभ होता हैं।
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बालकों की पुष्टि हेतु उपचार
पहला प्रयोगः तुलसी के पत्तों का 10 बूँद रस पानी में मिलाकर रोज पिलाने से स्नायु एवं हड्डियाँ मजबूत होती हैं।
दूसरा प्रयोगः शुद्ध घी में बना हुआ हलुआ खिलाने से शरीर पुष्ट होता है।
मिट्टी खाने परः बालक की मिट्टी खाने की आदत को छुड़ाने के लिए खूब पके हुए केलों को शहद के साथ खिलायें।

शिशु को नींद न आने पर करे ये उपाय
पहला प्रयोगः बालक को रोना बंद न होता हो तो जायफल पानी में घिसकर उसके ललाट पर लगाने से बालक शांति से सो जायेगा।
दूसरा प्रयोगः प्याज के रस की 5 बूँद को शहद में मिलाकर चाटने से बालक प्रगाढ़ नींद लेता है।
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 मोटापा कम करने के आयुर्वेदिक व घरेलू उपाय

मानव शरीर की रचना पंच तत्वो से होती है। पृथ्वी, अग्नि, जल, आकाश और वायु; इन पंच तत्वो से निर्मित मानव शरीर को जीवंत रहने के लिए, और ऊर्जा प्राप्त करने के लिए संतुलित आहार ग्रहण करना परम आवश्यक है। हर किसी के लिए नित्य व्यायाम और योग करना लाभदायी होता है। यह शरीर एक कोरे कागज़ की तरह होता है, जिस पर हम अपने आचरण की कलम से कुछ भी लिख सकते हैं। जहाँ खानपान में लापरवाही और अनियमित दिनचर्या मानव शरीर को मोटापे और तरह-तरह की बीमारियों की तरफ धकेलती है वहीँ एक अच्छी डाइट लेना और नित्य व्यायाम करना हमें एक स्वस्थ गठीले शरीर का मालिक बना सकता है।
मित्रों, इस मशीनी युग में जहाँ हमें पहले की अपेक्षा बहुत कम शारीरिक श्रम करना पड़ता है बहुत से लोग मोटापे का शिकार होते जा रहे हैं। मैंने कहीं पढ़ा था-
इस दुनिया में जितने लोग खाने की कमी से नहीं मरते उससे कहीं ज्यादा अधिक खाने कि वहज से मर जाते हैं।
दोस्तों, यहाँ ये समझना ज़रूरी है कि मोटापा सिर्फ अपने आप में एक समस्या नहीं है बल्कि इसका रिश्ता और बहुत सी गंभीर बीमारियों जैसे :
  1. डायबिटीज (टाइप -2),
  2. हाइ ब्लड प्रैशर,
  3. दिल की बीमारियाँ और स्ट्रोक,
  4. कुछ खास प्रकार के केन्सर,
  5. अनिंद्रा की बीमारी,
  6. किडनी की बीमारी,
  7. फैटी लिवर- लिवर में मेद जमा होने से लीवर खरब होने की बीमारी,
  8. औस्ट्येआर्थराइटिस- जोड़ो की बीमारी, आदि से भी है।

इसलिए कुछ भी करके आपको अपने Weight Reduce करने के लिए पूरे efforts करने चाहिए। 
वजन कम करने के आयुर्वेदिक और घरेलू उपाय
  1. एक ग्लास थोड़ा गरम पानी ले कर उसमे एक चम्मच काली मिर्च पाउडर, और चार चम्मच नींबू पानी, तथा एक चम्मच शहद मिला कर नित्य हर रोज सुबह पीने से वजन कम होता है। और अगर खाली पेट सुबह में गरम पानी में नींबू निचोड़ कर उसमे एक चम्मच शहद मिला कर रोज पिये तो भी वजन कम होता है।
  2. गोभी के पत्ते वजन कम करने के लिए काफी लाभदायी होते है। कच्चे सैलड में गोभी के पत्ते उबाल कर, या फिर कच्चे खाने से वजन कम होता है।
  3. भोजन के पूर्व टमाटर का सूप पीने से या टमाटर कच्चे खाने से भी वजन कम होता होता है।
  4. हर प्रकार की हरी पत्ती वाली सब्जी का आहार करें। यह सारे आयुर्वेदिक उपाय होने के कारण इनके साइड इफफ़ेक्ट्स नहीं होते हैं।
  5. सुबह का नाश्ता मध्यम मात्रा में लेना चाहिए। दोपहर का खाना भर पेट खाना चाहिए। क्योंकि दोपहर के समय पाचन तंत्र सबसे ज्यादा सक्रिय होता है।
  6. रात का खाना सोने से 3-4 घंटे पहले लेना चाहिए। रात्री का समय सोने के लिए होता है, इसलिए पाचन तंत्र को भोजन पचाने के लिए अधिक श्रम करना पड़ता है। रात का खाना कम कैलोरी वाला होना चाहिए।
  7. खाना हमेशा एक रस हो जाए उतनी देर चबा कर ही निगलना चाहिए।
  8. खाना हो सके तो थोड़ा गरम कर के ही खाना चाहिए। गरम किया हुआ खाना, या गरम पका हुआ खाना ठंडे खाने के मुक़ाबले ज़्यादा जल्दी पचता है। और पूरे दिन के समय थोड़ा-थोड़ा करके पानी पीते रहेना चाहिए ताकी खाना पचता रहे। भोजन को पचाने के लिए पानी की आवश्यकता होती है। हालांकि, एक्सपर्ट खाने के समय पानी ना पीने की सलाह देते हैं, इसलिए खाते समय पानी पीना avoid करना चाहिए।संरक्षित किया हुआ खाना खाने से परहेज करे। प्रोसेस्ड फूड खाना कम करें।
  9. हर ऋतु पर आने वाले फल का आहार करें।
  10. हर दिन के भोजन में तीखा, मीठा, फीका, सादा, चटपटा, खट्टा आदि सारे स्वादों का आनंद लें, क्योंकि हर एक स्वाद का प्रकार मानवीय शरीर के पाचनतंत्र को खाना हजम करने में अलग अलग तरीके से सहायक बनता है।
  11. तले हुए खाने से ज्यादा भुने उए व्यंजन का आहार चुने।
  12. खाना खाने के तुरंत बाद कभी न सोएं।


वजन घटाने के लिए खानपान

  1. वजन घटाने के लिए सुबह उठ कर कुछ भी खाये बिना शुद्ध पानी पीना लाभ दायी होता है। और अगर वह पानी पूरी रात पीतल के बरतन में भर कर रखा हुआ हो, तो और भी फायदेमंद होता है।
  2. बिना कुछ खाये पानी पी कर कसरत करने और चलने से शरीर की नसों को ऊर्जा प्राप्त होती है। तथा मन प्रफुल्लित होता है।
  3. ग्रीन टी और नींबू पानी भी वजन घटाने के लिए काफी उपियोगी हैं।
  4. नाश्ते के पूर्व सुबह या दोपहर में खाने के दो तीन घंटे बाद ग्रीन टी और नींबू का रेगुलर सेवन वजन कम करने मे मदद रूप साबित होता है।
  5. पका हुआ नींबू और शहद मिला कर पीने / चाटने से भी वजन कम हो सकता है।
  6. एसिडिटी ना हो तब रात को हल्दी वाला पतला दूध (बिना मलाई वाला) पीने से भी वजन घटाने में मदद मिलती है।
  7. त्रिफला, आमला और हरड़े, दाँत और पेट के लिए उत्तम होते हैं। दाँत मजबूत होंगे तो खाना चबाना आसान होगा और खाना ठीक से चबाया जाएगा तो पाचन तंत्र सही तरीके से सारा खाना हजम कर पाएगा, और खाना ठीक हजम होगा तो पेट मे किसी तरह का अपचित आहार इकट्ठा नहीं होगा। जब भी खाना पूरी तरह से नहीं पचता है तब उस आहार का परिवर्तन चरबी / FAT में हो जाता है। इसलिए त्रिफला, आमला और हरड़े का नित्य सेवन करें।
  8. वजन नियंत्रित करने के लिए ताजा सब्जियाँ, फल और बीन्स का आहार उत्तम रहता है। जैसे कि ककड़ी, खीरा, मूली, चना, मूंग, मटर, पपीता, गाजर और हर प्रकार की दाल खाना हितकारी होता है।
  9. स्वदेशी मसाले जैसेकि हींग, अजवायन, काली मिर्च, लौंग, और कड़ीपत्ता जेसे देसी मसाले अगर खाने में सही मात्रा में डाले जाते रहें तो पाचन तंत्र को खाना हजम करने में मदद मिलती है। और पेट साफ रहने के कारण शरीर में फैट जमा नहीं होता है।
  10. प्रति दिन थोड़े मात्रा में ड्रायफ़ृट्स बादाम, पिस्ता, अंजीर, काजू, और किशमिस खाने से प्रोटीन विटामिन मिलते हैं और पाचन तंत्र भी अच्छा रहता है।
  11. खाने के बाद तुरंत पानी पीना तेजी से वजन बढाता है।
  12. खाना थोड़ी-थोड़ी मात्रा में ज्यादा बार खाने से पाचन तंत्र को श्रम कम पड़ता है जिस से अपाचन नहीं होता और चरबी भी नहीं बढ़ती।
  13. शक्कर वाले शरबत, मीठे पकवान, संचय किया हुआ खाना, कोल्डरिंक्स, बेकिंग प्रोडक्टस (ब्रैड, पाव), और बीयर वजन बढ़ाते है।
  14. तला हुआ खाना, देसी घी, आलू, मैदा युक्त व्यंजन, चावल, चीनी वगैरह चरबी बढ्ने में सब से अहेम भूमिका निभाते हैं।
  15. खाने के समय बाते करना, टीवी देखना, काफी नुकसान देह है, इस तरह खाने से आदमी अपनी भूख से अधिक खा लेता है और उसे पता भी नहीं चलता।


वजन घटाने के लिए व्यायाम

तंदरुस्त जीवन का मूल मंत्र व्यायाम है। व्यायाम और योग बीमारियों को मानव शरीर से दूर रखता है। स्फूर्ति प्रदान करता है। और प्रतिकार शक्ति बढ़ता है। समतोल आहार और व्यायाम का सही संगम मानव शरीर को लोहे जैसा मजबूत बना देता है।
  • Daily life में लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का उपयोग करना चाहिए।
  • प्रति दिन एक से तीन किलोमीटर वॉक करना चाहिए।
  • आयुर्वेद शास्त्र के मुताबिक सूर्यास्त के बाद जितना जल्दी हो सके सो जाना और सूर्योदय होने से पूर्व उठ  जाना शरीर के लिए उत्तम होता है।
  • प्राणायाम, कपालभाती, शीर्षासन, मयूरआसन, धनुराशन, पवनमुक्तआसन, सूर्य नमस्कार, बटरफ्लाइ, इत्यादि  कसरतें काफी जल्दी से शरीर को फायदा देती हैं।
  • टीवी देखने और विडियो गेम्स खेलने की वजाय बाहर मैदान मे जा कर दौड़ भाग कर के खेले जाने वाले खेल खेलना कलेरी बर्न करता है।
  • हल्के सूर्य की रोशनी में चलने से पसीना जल्दी आता है। और पसीना आने से कलरी जल्दी बर्न होती है।
  • नींद अगर पूरी ना हो पाये तब भी वजन बढ़ सकता है। अनिंद्रा के कारण शरीर वजन बढ़ाने वाले होर्मोन त्याग करता रहता है। इसलिए रात को पर्याप्त नींद लेना आवश्यक है।
  • मानसिक तनाव भी मोटापा बढ़ा सकता है। मानसिक तनाव / डिप्रेशन होने पर कई लोग रोते है, कई लोग कसरत करने लगते है, कई लोग काउंसिलिंग का सहारा लेते है, और कई लोग ज़्यादा खाना खाने लग जाते हैं। दोपहर की नींद भी वजन में बढ़ोतरी करती है।
  • तत्काल वजन करने के इरादे से कई लोग डाएट प्लान बना कर उसका पालन करते हैं। और साथ में नित्य कसरत कर के अच्छे परिणाम पाप्त कर ले ते हैं। परंतु एक बार वजन घटाने के बाद अपनी पुरानी लापरवाह आदतों की ओर लौट जाते हैं। और दुगनी तेज़ी से अपना वजन बढ़ा लेते हैं। इसलिए एक बार वजन नियंत्रण में आ जाने के बाद अनुशासन काफी आवश्यक होता है।
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