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यदि डिप्रैशन की चपेट में आ रहे हैं तो इसे करें ! हमारा मष्तिस्क जो सम्पूर्ण  शरीर का नियंत्रण करता है करोड़ों छोटी-छोटी कोशिकाओं का बना है, उन्हें न्यूरोन्स कहा जाता है |  एक न्यूरोन दूसरे न्यूरोन्स से संपर्क कुछ खास पदार्थों के जरिए करता है, इन पदार्थों को न्यूरोट्रांसमीटर कहा जाता है | दिमाग में कुछ ऐसे न्यूरोट्रांसमीटर हैं जिनकी मात्रा में बदलाव आने से डिप्रैशन हो जाता है |  समय के साथ डिप्रैशन बढ़ने से दिमाग की कोशिकाओं में ऐसे बदलाव आ जाते हैं, जिनसे रोगी के मन में स्वयं को खत्म करने के विचार आने लगते हैं | 

डिप्रैशन के लक्षण :

•यदि आप सो नहीं पाते हैं अथवा ज्यादा सोने लगते हैं

•किसी भी चीज पर उतना ध्यान नहीं लगा पाते जो कि आप पहले आसानी से कर पाते थे

•उदास व निराश रहते हैं, प्रयास करने के बाबजूद भी अपने मन से नकारात्मकता को निकाल नहीं पा रहे हैं

•भूख नहीं लगती या जरूरत से ज्यादा खाने लगे हैं

•जरूरत से ज्यादा परेशान, गुस्सैल या चिड़चिड़े रहने लगे हैं |

•शराब या धूम्रपान करने लगे हैं, या ऐसी किसी गतिविधि में शामिल हो रहे हैं जो कि आप जानते हैं कि वह गलत है

•मन में यह विचार आते हों कि जीवन जीने का कोई फायदा नहीं है यदि उपर्युक्त लक्षण उत्पन्न हो रहे हों तो सावधान हो जाएँ |

 

यह डिप्रैशन हो सकता है | डिप्रैशन अधिकतर  25 से 45 वर्ष की उम्र के लोग को प्रभावित करता है | परंतु बच्चों एवं वृद्धावस्था में भी यह बीमारी हो सकती है | पुरुषों की तुलना में महिलाओं में डिप्रैशन 2-3 गुना ज्यादा पाया जाता है | डिप्रैशन समाज के हर वर्ग को प्रभावित करता है | यह सोचना गलत है कि जिन लोगों के पास जिन्दगी के सब ऐशो-आराम हैं उन लोगों को डिप्रैशन नहीं हो सकता |

बच्चों में डिप्रैशन के लक्षण :

चिड़चिड़ापन, कहना न मानना, पढ़ाई में ध्यान न देना, स्कूल न जाने के बहाने बनाना |

डिप्रैशन की चिकित्सा : बदलती जीवनशैली, तनावमुक्त वातावरण और प्रदूषित पर्यावरण की वजह से भी अवसाद के मामले निरंतर बढ़ रहे हैं। योग में अवसाद के उपचार के लिए ब्रह्म मुद्रा आसन बहुत कारगर योगासन है। इसके नियमित अभ्यास से आपको न सिर्फ अवसाद से मुक्ति मिलती है बल्कि कई मानसिक व शारीरिक समस्याओं का भी निदान होता है।

आराम की मुद्रा में बैठ जाएँ. सर्वप्रथम श्वांसों को गहराई से छोड़ने का प्रयास करें । केवल सांसों को गहरा-गहरा लें और छोड़ें। इस प्रक्रिया में शरीर की दूषित वायु निष्कासित होती है और तन- मन प्रफुल्लित रहतें हैं ।

ब्रह्म मुद्रा करने की विधि :

•पद्मासन,वज्रासन,सिद्धासन या पालथी लगाकर बैठ जाएँ

•गर्दन को  श्वास भरते हुए धीरे-धीरे दाईं ओर ले जाएं। कुछ देर रुकें फिर श्वास छोड़ते हुए गर्दन को सामान्य स्थिति में ले आयें | पुनः श्वास भरते हुए गर्दन को बाईं ओर ले जाएं एवं श्वास छोड़ते हुए सामान्य स्थिति में लायें | यह एक चक्र हुआ | इस प्रकार कम से कम 5 चक्र करें |

•सिर को 3-4 बार क्लॉकवाइज (घडी की सुई की दिशा में) और उतनी ही बार एंटी क्लॉकवाइज घुमाएं।

 

सूर्य अनुलोम-विलोम प्राणायाम विधि :

पद्मासन अथवा सुखासन में बैठकर बायें नथुने को बंद करें और दायें नथुने से धीरे- धीरे अधिक से अधिक गहरा श्वास भरें। श्वास लेते समय आवाज न हो इसका ख्याल रखें। अब अपनी क्षमता के अनुसार श्वास भीतर ही रोक रखें। (कुंभक की यह अवधि कुछ दिनों के अभ्यास से धीरे धीरे एक डेढ़ मिनट तक बढ़ायी जा सकती है।) जब श्वास न रोक सकें तब दायें नथुने से ही धीरे धीरे बाहर छोड़ें। झटके से न छोड़ें। इस प्रकार 9 से 27 प्राणायाम करें।

घरेलू नुस्खे :

इलायची - इलायची के पिसे हुए बीज को पानी के साथ उबाल कर या चाय के साथ लिया जा सकता है।

काजू - विटामिन बी की मात्रा अधिक होने के कारण काजू हमारे स्वाद और तंत्रिका तंत्र को ठीक रखता है।

सेब - सेब खाने से डिप्रेशन दूर रहता है क्योंकि सेब में विटामिन बी ,फास्फोरस और पोटैशियम होते हैं जिनसे कि ग्लूटामिक एसिड का निर्माण होता है।

अवसाद की स्थिति में यह ध्यान रखें :

•महत्वपूर्ण निर्णयों को टालें जैसे कि शादी करना या तलाक से संबंधित बातें या नौकरी बदलना |

•अपने निर्णयों को अपने उन शुभचिंतकों के साथ बाटें, जो आपको भलीभांति जानते हों और आपकी स्थिति का सही आकलन करें |

•बड़े बड़े कार्यों को छोटे छोटे हिस्सों में बांटे, कुछ काम की प्राथमिकताएं निर्धारित करें और ऐसा कार्य करें, जिसे संपन्न करने की आपमें पूर्ण क्षमता हो |

•अन्य लोगों के साथ समय बिताएं और किसी भरोसेमंद मित्र या रिश्तेदार के साथ अपनी गुप्त बातों को बताएं |अपने आपको सबसे अलग थलग करने की कोशिश न करें और दूसरों को आपकी मदद करने दें |

•खुद को हल्के फुल्के कार्यों में या व्यायाम में व्यस्त रखें , ऐसे कार्य करें, जिसमे आपको आनंद मिले | जैसे कि फिल्म देखना, बाल्गेम खेलना |

•सामाजिक, धार्मिक या अन्य कार्यकमों में हिस्सा लें |

पेट की समस्या से हर घर में अधिकतर व्यक्ति परेशान होते हैं। पेट की मुख्‍य समस्‍याओं में कमजोर पाचन तंत्रकब्‍जगैस बनना हो सकता है। इनके लिए डॉक्‍टरी इलाज करने के साथ ही आप इन घरेलू नुस्‍खों को भी अपना सकते हैं। आज हम आपको पेट की आम समस्‍याओं के लिए इलाज के लिए घरेलू चीजों से बनने वाले 4 चूर्ण के बारे में बता रहे हैं। इनके प्रयोग से कई रोगों से मुक्त हो सकते है।

गैस हर चूर्ण :

सामग्री

·       10 ग्राम सेंधा नमक

·       10 ग्राम हींग

·       10 ग्राम सज्जीखार ( शुद्ध )

·       10 ग्राम हरड़ छोटी

·       10 ग्राम अजवायन

·       10 ग्राम काली मिर्च

चूर्ण बनाने की विधि

इस चूर्ण को बनाने के लिए उपर्युक्त  सामग्री को इक्कठा करें और अच्छी तरह से बारीक पीस लें। जब पाउडर बन जाए तो उसे किसी बारीक कपड़े या छन्‍नी से छान कर किसी कांच की शीशी में भरकर रख लें।

गैस और अपच के लिए :

सामग्री

·       जीरा 120 ग्राम 

·       सेंधानमक 100 ग्राम 

·       धनिया 80 ग्राम

·       कालीमिर्च 40 ग्राम 

·       सोंठ 40 ग्राम

·       छोटी इलायची 20 ग्राम

·       पीपर छोटी 20 ग्राम 

·       नींबू सत्व 15 ग्राम 

·       खाण्ड देशी 160 ग्राम

चूर्ण बनाने की विधि

नींबू और खाण्‍ड को छोड़ कर बाकी की सभी सामग्रियों को पीस कर चूर्ण तैयार करें।  फिर उसमें नींबू निचोड़े और खाण्‍ड मिलाएं। इस मिश्रण को 3 घंटे के लिये एक कांच के बरतन में रख दें।  फिर इसका सेवन खाना खाने के बाद 2 से 5 ग्राम करें।

कब्‍ज निवारक चूर्ण

सामाग्री

·       जीरा

·       अजवाइन

·       काला नमक

·       मेथी

·       सौंफ

·       हींग

चूर्ण बनाने की विधि

सबसे पहले जीराअजवाइनमेथी और सौंफ को अलग-अलग धीमी आंच पर भून लें। भूनने के बाद इन्‍हें अलग-अलग बारीक पीस लें। इसके बाद एक बर्तन में काला नमक और आधा चम्‍मच हींग लें। अब इसमें जीरासौंफअजवाइन का पाउडर डाल लें। इन तीनों से कम मात्रा में मेथी पाउडर डालें। इस मिश्रण को अच्‍छी तरह मिला लें। ध्‍यान ये रखना है कि जीराअजवाइन और सौंफा की मात्रा समान होनी चाहिए। इसको अच्‍छी तरह से मिक्‍स करने के बाद किसी डिब्‍बे में रख लें।

 

पेट के लिए रामबाण है यह चूर्ण

खाना खाने के बाद कई लोगों को बदहजमी हो जाती है। कभी-कभी तो पेट दर्द बर्दाशत से बाहर हो जाता है।इस चूर्ण से पाचन क्रिया ठीक रहती है।

सामग्री

·       अनारदाना 10 ग्राम

·       छोटी इलायची 10 ग्राम

·       दालचीनी 10 ग्राम

·       सौंठ 20 ग्राम

·       पीपल 20 ग्राम

·       कालीमिर्च 20 ग्राम

·       तेजपत्ता 20 ग्राम

·       पीपलामूल 20 ग्राम

·       नींबू का सत्व 20 ग्राम

·       धनिया 40 ग्राम

·       सेंधा नमक 50 ग्राम

·       काला नमक 50 ग्राम

·       सफेद नमक 50 ग्राम

·       मिश्री की डली 350 ग्राम

चूर्ण बनाने की विधि

सेंधा नमककाला नमकसफेद नमकमिश्री और नींबू का सत्व को छोड़कर सभी सामान को कड़ी धूप में 2-3 घण्टे सुखा लें। फिर इसे मिक्सी में डालकर बारीक पीस लें।

इसके बाद बाकी सामान को अलग से बारीक पीस लें और फिर सभी सामानों के इस पाउडर को अच्छे से मिला लें। अब इसे किसी कांच की शीशी भरकर रख लें।

 

कफ एक ऐसी संरचनात्मक अभिव्यक्ति है जो द्रव्यमान को दर्शाता है यह हमारे शरीर के आकार और रूप के लिए भी ज़िम्मेदार है। जैविक रूप से, यह द्रव और पृथ्वी का संयोजन है। कफ के अणु शरीर के जटिल अणु होते हैं जो कोशिकाओं में उत्तकों, ऊतकों के अंगों और जो पूरे शरीर में अंगों की स्थिरता को बनाये रखते है। जैविक रूप से, सभी कोशिकाएं और उत्तक आदि कफ दोष से बने है,  हालांकि, इसकी संरचना में तरल और ठोस तत्वों के भिन्न अनुपात हो सकते हैं।

कफ की रचना

कफ की रचनाजल (पानी / तरल पदार्थ) + पृथ्वी (पृथ्वी / ठोस)
हमारे शरीर में लगभग 50 से 70% पानी या तरल पदार्थ होते हैं। शरीर के पानी की  2/3 मात्रा कोशिकाओं के भीतर मौजूद इंट्रासेल्युलर तरल पदार्थ हैं। शरीर का एक तिहाई पानी कोशिकाओं के बाहर मौजूद कोशिकी द्रव है। यह द्रव शरीर और कफ में जल की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। शरीर के बड़े ढांचे जैसे हड्डियां, मांसपेशियां, अन्य अंगो के ठोस द्रव्य शरीर और कफ में पृथ्वी अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। कफ दोष के द्रव पित (Pitta Dosha) के लिए वाहन का काम करते है और वात (Vata Dosha) को नियंत्रण में रखते है।

कफ के कार्य, संक्षेप में-कफ दोष निम्नलिखित कार्य करता हैं:

  1. उपचय
  2. अवलंबन ​​और सामूहिकता
  3. स्नेहन – जोड़ों को स्नेहन जैसे
  4. गठन – शरीर के तरल पदार्थ और इंट्राव्हास्कुलर घटकों का निर्माण और रखरखाव
  5. शरीर के विकास और विकास
  6. शरीर की स्थिरता और दृढ़ता
  7. शक्ति
  8. रक्षा
कफ दोष एनोबोलिज़्म और जटिल अणुओं के गठन के लिए जिम्मेदार है, इसलिए यह पित के विपरीत काम करता है और इस के द्वारा पैदा की गयी अपचयता को जांचता है।
  • कफ शरीर का प्रमुख संघटन है। यह शरीर के मुख्य द्रव्यमान के लिए जिम्मेदार है।
  • सभी पोषक तत्व प्रमुखता से कफ दोष का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • शरीर में मौजूद तरल पदार्थ घर्षण प्रदान करते है और विभिन्न कोशिकाओं को पोषण प्रदान करता है
  • यह शरीर को ताकत देता है और शरीर में सभी मांसपेशियां कफ दोष का प्रतिनिधित्व करती हैं
  • यह प्रजनन क्षमता के लिए भी जिम्मेदार है
मुख्य कफ स्थान
कफ पूरे शरीर में मौजूद है और यह शरीर के पूरे द्रव्यमान के लिए ज़िम्मेदार है, लेकिन आयुर्वेद ने इसके कुछ प्रमुख स्थानों का वर्णन किया है जहां कफ दोष की मुख्य क्रियाएं देखी जा सकती हैं। कफ विकारों के इलाज के लिए आयुर्वेद में इस के कुछ चिकित्सीय महत्व हैं। दिल के ऊपर के सभी हिस्सों को कफ क्षेत्र माना जाता है।
  • सिर
  • गला
  • छाती
  • फेफड़े
  • संयोजी ऊतक
  • मोटे टिश्यू
  • स्नायुबंधन
  • लसीका
  • टेंडॉन्स

कफ के  उपप्रकार

कफ के पांच उपप्रकार हैं
  1. क्लेदक कफ
  2. अवलम्बक कफ
  3. बोधक कफ
  4. तर्पक कफ
  5. श्लेष्मक कफ

क्लेदक कफ

क्लेदक कफ पाचन नाली और उनमे होने वाला बलगम स्राव क्लेदक कफ दोष का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी प्रकृति चिपचिपी, मीठी, ठंडी और लसदार है।

स्थान

  • पेट
  • बृहदान्त्र से आंत

सामान्य कार्य

क्लेदक कफ  भोजन को गीला करता है और यह  खाने को छोटे कणों में  विभाजित करने में पाचक पित की मदद करता है। यह पाचन को सही रखता है और भोजन के मिलने में पित की सहायता करता है। यह पेट से पाचनांत्र तक भोजन को आगे करने में वात की सहायता करता है। उसके बाद भोजन को आंत और उसके बाद बृहदान्त्र तक पहुँचाने में भी यह मदद करता है। क्लेदक कफ दोष जठरांत्र प्रणाली को चिकनाई दे कर सहायता करता है।

इसके बढ़ने से होने वाले रोग

क्लेदक कफ का बढ़ना पाचन समस्यायों को बढ़ा सकता हे जैसे कड़ी मल के साथ कब्ज का होना।

अवलम्बक कफ

अवलम्बक कफ छाती में मौजूद होता है और फेफड़ों और दिल को पोषण प्रदान करता है। यह हृदय की मांसपेशियों और फेफड़ों के ऊतकों के गठन में अहम भूमिका निभाता है। यह कफ दोष का प्रतिनिधित्व करता है, जो अंतरीय द्रव और बलगम स्राव का गठन करता है, जो वायुकोष्ठिका के बीच घर्षण को चिकना बनाता है और रोकता है।

स्थान

छाती हृदय, फेफड़े के साथ और छाती के आसपास की सीरस झिल्ली और उसके बीच के स्थान आदि।

सामान्य कार्य

  • दिल और फेफड़ों के प्रारंभिक द्रव्यमान का गठन
  • चिकनाई और घर्षण को रोकने के लिए
  • पौष्टिक मायोकार्डियम और एलिवोलि
  • परिसंचरणऔर श्वसन में सहायक

 इसके बढ़ने से होने वाले रोग

  • दिल और फेफड़ों के रोग
  • आलस्य

बोधक कफ

बोधक कफ मुँह के छेद और गले में रहते हैं। लार इसका अच्छा उदहारण है। यह भोजन को गीला करता है और भोजन के कणों को घोलता है। जब यह स्वाद कलिकाओं के सम्पर्क में आता है तो यह भोजन के स्वाद को महसूस करने में मदद करता है।

स्थान

मुँह की कैविटी और गला

सामान्य कार्य

  • खाने को गीला करना और भोजन के कणों को घोलना
  • खाने के स्वाद को पहचाने में मदद करना

इसके बढ़ने से होने वाले रोग

  • कब्ज़ की शिकायत
  • स्वाद परिवर्तन

तर्पक कफ

सिर तर्पक कफ का मुख्य स्थान है। दिमाग की प्राथमिक द्रव्यमान इसके कारण है। इसे आगे अंदर के द्रव और मस्तिष्कमेरु द्रव्य द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।

स्थान

क्रेनियल गुहा तर्पक कफ का मुख्य स्थान है

सामान्य कार्य

  • कपाल गुहा और मस्तिष्क के मुख्य द्रव्यमान को बनाना
  • मस्तिष्क और अनुभव करने वाले अंगों को पोषण प्रदान करना
  • संवेदी और मोटर केंद्रों को उनका प्राकृतिक कार्यो की करने का समर्थन करना

इसके बढ़ने से होने वाले रोग

  • स्मरण शक्ति कम होना
  • इंद्रियों, मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के प्राकृतिक कार्यों में खराबी या गड़बड़

श्लेष्मक कफ

श्लेष्मक कफ मुख्य रूप से स्नेहन के लिए जिम्मेदार है। यह जोड़ों में मौजूद होता है और यह कफ जोड़ों में श्लेष्म द्रव का यह अच्छा उदाहरण है।

स्थान

शरीर के जोड़ श्लेष्मक कफ का मुख्य स्थान है।

सामान्य कार्य

  • जोड़ों और इसके आसपास की संरचनाओं को पोषण प्रदान करना
  • जोड़ों को चिकनाई करके हिलने के दौरान घर्षण को रोकना

इसके बढ़ने से होने वाले रोग

  • अस्थिसंधिशोथ
  • जोड़ों का दर्द
कफ चक्र
भोजन के पाचन से संबंधितभोजन के पचने से पहले (खाना खाने के बाद जब आप पेट को भरा हुआ महसूस करें और पूर्ण संतुष्टि हो)*
भोजन खाने का संबंधखाना खाने के बाद*
आयु का संबंधबचपन
सुबह से  संबंधसुबह लगभग 6AM से 10 AM तक
रात्रि से संबंधलगभग 6 PM से 10 PM तक
* हालांकि, पित ने अपना काम शुरू कर दिया है, लेकिन अभी भी कफ प्रमुख है।
कफ चक्र के अनुसार दवाईआं लेना
  • स्वाभाविक रूप से, कफ ऊपर की अवधि में प्रभावशाली है, जैसा कि ऊपर दी तालिका में चर्चा की गई है।
  • कफ दोष को शांत करने वाली दवाईआं भोजन करने के बाद लेनी चाहिए। यह तब दी जाती है जब आप पेट के भारीपन जैसी समस्या से पीड़ित हों।
  • कफ दोष को शांत करने वाली दवाईआं सुबह 6 AM से 10 AM और रात को लगभग 6 PM से  10 PM तक लेनी चाहिए।यह कफ विकारों पर लागू होता है।
कफ और मौसम
कफ का संचय (कफ छाया)सर्दियों का अंत (शिशिर)
कफ का अधिक बिगड़ना (कफ प्रकोप)वसंत ऋतू (वसंत )
बढ़ी हुई कफ का शमन (कफ प्रश्म)गर्मी (ग्रीष्म)
कफ के कम होने के लक्षण और स्वास्थ्य की स्थिति

  • त्वचा की शुष्कता बढ़ जाती है
  • मीठे स्वाद, तैलीय और भारी भोजन वाले पर्दार्थों को खाने की इच्छा
  • अधिक प्यास
  • पेरिस्टलसिस के हिलने में कमी और कब्ज का होना (वात उत्तेजना)
  • जोड़ों, मांसपेशियों और हड्डियों में कमजोरी महसूस करना
  • चक्कर
  • सामान्यकृत कमजोरी
बढे हुए कफ के लक्षण और स्वास्थ्य स्थितियां

  • अत्यधित थूक के साथ खांसी
  • छाती में रक्त संचय
  • फेफड़ों में संचित श्लेष्म के कारण सांस न आना
  • पीली, ठंडी और चिपचिपी त्वचा
  • अत्यधिक लार
  • आलस्य
  • उनींदापन
बहुत अधिक बिगड़े हुए कफ के लक्षण
  • मुँह में मीठा या नमकीन स्वाद
  • भारीपन के साथ त्वचा का कसा हुआ होना
  • त्वचा के ऊपर मोटे और गहरे पेस्ट के लगे होने का अनुभव होना
  • सूजन
  • सफेद रंग का मलिनकिरण
  • खारिश (खाज )
  • अधिक नींद
  • सुन्न होना और अकड़ना
कफ को संतुलित करने के उपाय :

इसके लिए सबसे पहले उन कारणों को दूर करना होगा जिनकी वजह से शरीर में कफ बढ़ गया है। कफ को संतुलित करने के लिए आपको अपने खानपान और जीवनशैली में ज़रूरी बदलाव करने होंगे। आइये सबसे पहले खानपान से जुड़े बदलावों के बारे में बात करते हैं।

कफ को संतुलित करने के लिए क्या खाएं :
  • कफ प्रकृति वाले लोगों को इन चीजों का सेवन करना ज्यादा फायदेमंद रहता है।
  • बाजरा, मक्का, गेंहूं, किनोवा ब्राउन राइस ,राई आदि अनाजों का सेवन करें।
  • सब्जियों में पालक, पत्तागोभी, ब्रोकली, हरी सेम, शिमला मिर्च, मटर, आलू, मूली, चुकंदर आदि का सेवन करें।
  • जैतून के तेल और सरसों के तेल का उपयोग करें।
  • छाछ और पनीर का सेवन करें।
  • तीखे और गर्म खाद्य पदार्थों का सेवन करें।
  • सभी तरह की दालों को अच्छे से पकाकर खाएं।
  • नमक का सेवन कम करें।
  • पुराने शहद का उचित मात्रा में सेवन करें।

कफ प्रकृति वाले लोगों को क्या नहीं खाना चाहिए :
  • मैदे और इससे बनी चीजों का सेवन ना करें।
  • एवोकैड़ो, खीरा, टमाटर, शकरकंद के सेवन से परहेज करें।
  • केला, खजूर, अंजीर, आम, तरबूज के सेवन से परहेज करें।


जीवनशैली में बदलाव :
  • खानपान में बदलाव के साथ साथ कफ को कम करने के लिए अपनी जीवनशैली में बदलाव लाना भी जरूरी है। आइये जाने हैं बढे हुए कफ दोष को कम करने के लिए क्या करना चाहिए।  
  • पाउडर से सूखी मालिश या तेल से शरीर की मसाज करें
  • गुनगुने पानी से नहायें।
  • रोजाना कुछ देर धूप में टहलें।
  • रोजाना व्यायाम करें जैसे कि : दौड़ना, ऊँची व लम्बी कूद, कुश्ती, तेजी से टहलना, तैरना आदि।  
  • गर्म कपड़ों का अधिक प्रयोग करें।
  • बहुत अधिक चिंता ना करें।
  • देर रात तक जागें
  • रोजाना की दिनचर्या में बदलाव लायें
  • ज्यादा आराम पसंद जिंदगी ना बिताएं बल्कि कुछ ना कुछ करते रहें।


कफ बहुत ज्यादा बढ़ जाने पर उल्टी करवाना सबसे ज्यादा फायदेमंद होता है। इसके लिए आयुर्वेदिक चिकित्सक द्वारा तीखे और गर्म प्रभाव वाले औषधियों की मदद से उल्टी कराई जाती है। असल में हमारे शरीर में कफ आमाशय और छाती में सबसे ज्यादा होता है, उल्टी (वमन क्रिया) करवाने से इन अंगों से कफ पूरी तरह बाहर निकल जाता है।

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