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महासुदर्शन चूर्ण एक आयुर्वेदिक औषधि है जो मुख्य रूप से रक्त में से विषैले पदार्थों को दूर करती है, बुखार सही करती हैं एवं पाचन तंत्र पर अपना सकारात्मक प्रभाव दिखाती है । महासुदर्शन चूर्ण में एंटीमलेरियल, एंटीपायरेटिक तथा एंटीवायरल गुण मौजूद होते हैं । यह चूर्ण हमारे शरीर में बैक्टीरिया एवं वायरस के संक्रमण को दूर करता है तथा हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाने में मदद करता है । 

बुखार चाहे किसी भी कारण से हुआ हो, चाहे बुखार वात एवं पित्त के कारण पैदा हुआ हो या वात, पित्त और कफ के कारण पैदा हुआ हो दोनों ही स्थितियों में इस चूर्ण का सेवन करने से लाभ होता है । यह चूर्ण पुरुषों, स्त्रियों, गर्भवती महिलाओं, प्रसूता महिलाओं एवं बच्चों को दिया जा सकता है । यह एक सुरक्षित तथा हर्बल आयुर्वेदिक औषधि है जिसका सामान्यतः कोई दुष्प्रभाव नहीं है । 

जब रोगी की पाचन शक्ति बहुत ज्यादा कमजोर हो जाती है तो ऐसे व्यक्ति का भोजन हजम नहीं होता है तथा भोजन हजम होने के बजाय पेट में सड़ता है । जिससे भोजन से आमविश उत्पन्न होता है जिस कारण रोगी को कभी-कभी बुखार भी हो जाता है । महासुदर्शन चूर्ण का सेवन करने से आम प्रकोप नष्ट होता है तथा यह चूर्ण पेट एवं आंतों को शुद्ध करता है एवं शरीर में से विषैले पदार्थों को बाहर निकालकर बुखार को दूर करता है । बुखार दो प्रकार का होता है नूतन ज्वर तथा जीर्ण ज्वर । जब बुखार 21 दिन से ज्यादा पुराना हो जाए तो उसे जीर्ण ज्वर कहा जाता है । दोनों ही स्थितियों में महासुदर्शन चूर्ण को देने से लाभ मिलता है । यदि कोई रोगी टाइफाइड ठीक होने के पश्चात अपना आहार विहार सही ना रखें तो ऐसे रोगी को बुखार दोबारा आ जाता है, जिससे रोगी और ज्यादा कमजोर हो जाता है तथा बुखार के कारण रोगी की भूख भी खत्म हो जाती है । इस स्थिति में महासुदर्शन चूर्ण को देने से बहुत अच्छा लाभ मिलता है । महासुदर्शन चूर्ण का सेवन करने से पसीना खूब आता है जिस कारण यह बुखार को बहुत जल्दी उतार देता है । यह मूत्रल है अर्थात इसका सेवन करने से मूत्र बहुत ज्यादा आता है । यह चूर्ण सभी प्रकार के बुखारो, मलेरिया, डेंगू, स्वाइन फ्लू, टाइफाइड, पुराना बुखार, सन्निपात ज्वर, विषम ज्वर, आम ज्वर एवं लीवर तथा स्पलीन के रोगों के कारण पैदा होने वाला ज्वर, शीत ज्वर, पाक्षिक ज्वर एवं मासिक ज्वर आदि में सफलतापूर्वक सेवन कराया जाता है । यह चूर्ण जिगर एवं तिल्ली से जुड़े हुए रोगों में भी फायदेमंद होता है । 

महासुदर्शन चूर्ण के चिकित्सकिय गुण Mahasudarshan Churna ke upyog- शीतल पाचक कृमिनाशक ज्वरनाशक एंटीबैक्टीरियल एंटीवायराल एंटीमलेरियल एंटीऑक्सीडेंट रक्तशोधक विरेचक महासुदर्शन चूर्ण के घटक द्रव्य Mahasudarshan Churna ke ghatak dravy- चिरायता सौरास्ट्री त्रिफला वच हरिद्रा त्वक दरहरिद्र पद्मका कंटकारी श्वेतचन्दना बृहती अतिविष कर्चूरा बला सुण्ठी शालपर्णी मरीचा पृश्निपर्णी पिप्पली विडंग मूर्वा टगर गुडुची चित्रक धन्वायसा देवदारु कटुका चव्य पर्पट पटोल मोथा लवंग त्रयमाणा वंशलोचन हृवेरा कमला नीम छाल अश्वगंधा पुष्कर तेजपत्र मुलेठी जटीफला स्थौणेया कुटज विदारीकन्द यवनी किरततिक्ता इंद्रायवा शिग्रु भारंगी 

महासुदर्शन चूर्ण के फायदे Mahasudarshan Churna ke fayde- यह चूर्ण मलेरिया, टाइफाइड, स्वाइन फ्लू, पुराने बुखार, आम ज्वर, विषम ज्वर एवं अन्य विभिन्न प्रकार के ज्वर उतारने में फायदेमंद होता है । यह हमारे शरीर में जीवाणुओं एवं वायरस को नष्ट करता है, क्योंकि इस चूर्ण में एंटीबैक्टीरियल तथा एंटीवायरल गुण मौजूद होते हैं । यह जिगर एवं तिल्ली के रोगों में लाभ पहुंचाता है । यह चूर्ण मूत्रल है अर्थात इसका सेवन करने से मूत्र अधिक आता है । यह चूर्ण हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाता है । तासीर में यह चूर्ण ठंडा है । यह पाचक एवं कृमि नाशक होता है । 

सेवन विधि एवं मात्रा Sevan vidhi evam matra- महासुदर्शन चूर्ण को 3 ग्राम से लेकर 6 ग्राम तक दिन में दो बार गर्म पानी से लेना चाहिए । इस चूर्ण को भोजन के पश्चात ही लेना चाहिए । अधिक जानकारी के लिए आप अपने डॉक्टर से संपर्क कर सकते है । 

सावधानियां एवं दुष्प्रभाव Savdhaniya evam dushprabhaav- निर्धारित मात्रा में सेवन करने से महासुदर्शन चूर्ण का कोई दुष्प्रभाव नहीं देखा गया है । इसे सभी उम्र के लोग, पुरुष, महिलाएं, बच्चे, बूढ़े, गर्भवती महिलाएं एवं प्रसूता के द्वारा लिया जा सकता है ।


मकरध्वज वटी मात्र एक आयुर्वेदिक औषधि ही नहीं है बल्कि यह एक रसायन है, जिसे हम आयुर्वेद का वरदान मान सकते हैं । मकरध्वज वटी काफी बहुमूल्य औषधि है, जिसका सेवन करने से 20 प्रकार के प्रमेह, पुरुषों के धातु संबंधी रोग जैसे वीर्य का पतलापन, पेशाब के साथ धातु का जाना, स्वपनदोष, शीघ्रपतन, नपुंसकता, स्तंभन शक्ति की कमी, कमजोरी, आंखों का अंदर धंस जाना एवं आंखों के सामने अंधेरा छाना, सिर दर्द, पेट अच्छी तरह साफ ना होना, बार-बार बातों को भूलना, स्मृति भ्रम, नसों की कमजोरी आदि में बहुत अच्छा लाभ होता है । यह औषधि केवल पुरुषों के रोगों में ही फायदा नहीं पहुंचाती बल्कि महिलाओं की प्रदर रोग में भी बहुत अच्छा फायदा पहुंचाती है । इन सभी रोगों के अलावा मकरध्वज वटी का सेवन करने से मूत्र मार्ग संक्रमण जैसे पेशाब का बार बार आना, पेशाब का रुक रुक कर आना, मूत्र नली में दर्द होना, सुजाक़ आदि रोगों में भी फायदा होता है । यह औषधि अत्यंत गुणकारी औषधि है जो बढ़ती हुई उम्र में रसायन की भांति सेवन की जाती है । इस औषधि का सेवन करने से रोग एवं बुढ़ापा व्यक्ति के नजदीक नहीं आता है । इस औषधि की जितनी तारीफ की जाए उतनी ही कम है ।

मकरध्वज वटी के घटक द्रव्य- Makardhwaj Vati ke ghatak dravy -
मकरध्वज 28.25% रस सिंदूर 16.70% मल्ल सिंदूर 4.04% जायफल (Myristica Fragrans) 9.74% जावंत्री (Myristica Fragrans)10.70% लौंग (Syzgium Aromaticum) 9.74% कपूर (Dryobalanops Aromatica)9.74% सफ़ेद मिर्च (Piper Nigrum) 9.74% अभ्रक भस्म 0.15% लोह भस्म 0.24% शुद्ध कुचला (stychnos Nuk vomica)0.24% चित्रकमूल (Plumbago Zeylanica)0.48% Excipients Q.S.
मकरध्वज वटी के चिकित्सकीय उपयोग - Makardhwaj Vati ke upyog मकरध्वज वटी का सेवन करने से निम्न समस्याओं में लाभ मिलता है । पुरुषों के धातु संबंधी रोग मूत्रमार्ग का संक्रमण महिलाओं का प्रदर रोग कामेच्छा में कमी शारीरिक दुर्बलता नींद ना आना पाचन तंत्र की गड़बड़ी मकरध्वज वटी के फायदे Makardhwaj Vati ke fayde स्वपनदो में लाभकारी मकरध्वज वटी night fall me labhkari makardhwaj vati अधिकांश नवयुवक युवावस्था में हस्तमैथुन एवं अप्राकृतिक मैथुन के द्वारा अपना सत्यानाश कर लेते हैं, जिससे उनका वीर्य पतला हो जाता है एवं उन्हें बहुत ज्यादा स्वपनदोष (night fall) होने लगता है । ऐसे युवक दिन प्रतिदिन कमजोर होते चले जाते हैं, उनके मन में मायूसी छाई रहती है, आत्महत्या करने के विचार मन में आते हैं, शादी करने से डर लगता है इत्यादि । ऐसे नवयुवकों को यदि मकरध्वज वटी को चंद्रप्रभा वटी के साथ सेवन कराया जाए तो बहुत अच्छा लाभ मिलता है । शीघ्रपतन में लाभकारी मकरध्वज वटी shighrapatan me labhkari makardhwaj vati यदि हस्तमैथुन, अप्राकृतिक मैथुन या बहुत ज्यादा स्त्री सहवास करने से शीघ्रपतन (premature ejaculation) की समस्या हो गई हो तथा वीर्य बहुत जल्दी डिस्चार्ज हो जाता हो, तो ऐसी स्थिति में मकरध्वज वटी को हिमालय कॉन्फीडो एवं न्यू टेंटेक्स फोर्ट के साथ सेवन करने से कमाल का फायदा होता है । यह जरूरी नहीं है किस शीघ्रपतन केवल अत्यधिक मैथुन से ही हो, कई बार इसका कारण मानसिक थकान, चिंता एवं खानपान की गड़बड़ी भी होती है । इसलिए शीघ्रपतन का उपचार करते समय अन्य बातों का भी ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है । वीर्य दोष में लाभकारी मकरध्वज वटी Veerya dosh me labhkari makardhwaj vati यदि वीर्य बहुत ज्यादा पतला हो गया हो एवं वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या बहुत ज्यादा कम हो गई हो तो मकरध्वज वटी का सेवन कराने से लाभ मिलता है । वीर्य विकारों में मकरध्वज वटी को चंद्रप्रभा वटी एवं पुष्पधन्वा रस के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है । नपुंसकता में लाभकारी मकरध्वज वटी napunsakta me labhkari makardhwaj vati जिन पुरुषों के लिंग में बिल्कुल भी तनाव ना आता हो तथा जो स्त्री संभोग करने के लायक ना हो, उन्हें मकरध्वज वटी को वसंत कुसुमाकर रस एवं शिलाजीत वटी के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है । नपुंसकता की स्थिति में लिंग की एक्सरसाइज करने का पंप का भी प्रयोग करना चाहिए, साथ ही हमदर्द का तिला डायनामोल का प्रयोग करने से भी कमाल का फायदा मिलता है । कामोत्तेजना बढ़ाने में लाभकारी मकरध्वज वटी Kamotejna me labhkari makardhwaj vati जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है वैसे वैसे व्यक्ति की कामोत्तेजना घटती जाती है । 40 साल की उम्र के बाद व्यक्ति की कामोत्तेजना बहुत ज्यादा कम हो जाती है । इसका कारण टेस्टोस्टरॉन के स्तर का कम होना होता है । ऐसी स्थिति में मकरध्वज वटी पुष्पधन्वा रस एवं कोच पाक के साथ सेवन करने से कामोत्तेजना बहुत ज्यादा बढ़ जाती है एवं व्यक्ति में 16 साल के लड़के जितना जोश आ जाता है । महिलाओं के प्रदर रोग में लाभकारी मकरध्वज वटी Pradar rog me labhkari makardhwaj vati मकरध्वज वटी महिलाओं के प्रदर रोगों में बहुत अच्छा फायदा पहुंचाती है । इस औषधि का सेवन करने से महिलाओं का प्रदर रोग (लुकोरिया) में लाभ मिलता है । मधुमेह (डायबिटीज) एवं उच्च रक्तचाप में लाभकारी मकरध्वज वटी Sugar me labhkari makardhwaj vati यह औषधि केवल धातु संबंधी विकार ही ठीक नहीं करती है बल्कि इसका सेवन करने से उच्च रक्तचाप एवं डायबिटीज जैसी बीमारी में भी बहुत अच्छा फायदा मिलता है ।
सेवन विधि एवं मात्रा - मकरध्वज वटी की एक से दो गोली दिन में दो बार सुबह एवं शाम भोजन के पश्चात ले । इसे दूध के साथ लेना चाहिए । दूध के अलावा इस औषधि को शहद, मक्खन या मलाई के साथ भी लिया जा सकता है । सावधानियां एवं दुष्प्रभाव सामान्यतः इस औषधि का कोई दुष्प्रभाव नहीं है । इस औषधि को गर्भवती महिलाओं एवं बच्चों को नहीं देना चाहिए ।

आजकल के भागदौड़ एवं तनाव भरी जीवन शैली के कारण असमय बाल सफेद हो जाते हैं। बाल डाई करना इस समस्या का एकमात्र विकल्प नहीं। कुछ घरेलू नुस्खे आजमा कर भी सफेद बालों को काला किया जा सकता है। जोकि सर्वथा हानिरहित एवं निरापद हैं।

इन उपायों से काला करें बाल :

  • 2 चम्मच मेंहदी पाउडर, 1 चम्मच दही, 1 चम्मच मेथी, 3 चम्मच कॉफी, 2 चम्मच तुलसी पाउडर, 3 चम्मच पुदीना पेस्ट मिलाकर बालों में लगाएं। तीन घंटे बाद शैम्पू करें। कम उम्र में सफेद हुए बाल फिर काले हो जाएंगे।

  • आंवला व आम की गुठली को पीसकर इस पेस्ट को प्रतिदिन - 30 मिनट सिर में लगाने से सफेद बाल काले होने लगते हैं ।

  • सूखे आंवले को पानी में भिगोकर उसका पेस्ट बना लें। इस पेस्ट में एक चम्मच युकेलिप्टस का तेल मिलाएं। मिश्रण को रात भर किसी लोहे के बर्तन में रखें। सुबह इसमें दही, नींबू का रस व अंडा मिलाकर बालों पर लगाएं। बालों में नई जान आ जाएगी। 15 दिन तक यह प्रयोग करने से सफेद बाल काले होने लगते हैं।

  • बादाम तेल, आंवला जूस व नींबू का जूस मिलाकर बालों की जड़ों में लगाएं बालों में चमक आ जाएगी व सफेद भी नहीं होंगे।

  • छोटी उम्र में सफेद होते बालों पर एक ग्राम काली मिर्च में थोड़ा दही मिलाकर सिर में लगाने से भी लाभ होता है।

  • 200 ग्राम आंवला, 200 ग्राम भांगरा, 200 ग्राम मिश्री, 200 ग्राम काले तिल इन सभी का चूर्ण बनाकर रोजाना 10 ग्राम मात्रा में लेने से कम उम्र में सफेद हुए बाल फिर से काले होने लगेंगे।

  • शीघ्र लाभ के लिए गाय के दूध का मक्खन या घी लेकर हल्के हाथों से बालों की जड़ों में लगाएं।सिर की त्वचा को पोषण मिलता है एवं बालों के सफेद होने की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है।

  • अदरक को पीसकर उसमें थोड़ा शहद मिलाकर पेस्ट बनाएं और अपने सिर पर लगाएं। इस उपाय को रोजाना अपनाने से सफेद बाल फिर से काले होने लगते हैं।

  • नारियल तेल में ताजे आंवला को इतना उबाले कि वह काला हो जाए। इस मिश्रण को ठंडा करके रात को सोने से पहले बालों में लगा लें व सुबह बाल धोएं।

  • नारियल तेल में मीठे नीम की पत्तियां को इतना उबाले की पत्तियां काली हो जाएं। इस तेल के हल्के हाथों से बालों की जड़ों पर लगाएं। बाल घने व काले हो जाएंगे।
 

बाल झड रहे हैं तो इन्हें आजमायें :

  • बालों में एलोवेरा जेल लगाने से भी बाल गिरना बंद हो जाते हैं और जल्दी सफेद नहीं होते।

  • प्रतिदिन प्रातः खाली पेट 20 मिली. आंवला जूस लेने से भी बाल लंबी उम्र तक काले बने रहते हैं एवं झड़ते भी नहीं हैं ।


बालों का रंग डार्क ब्राउन करने के लिए :

  • मेहंदी को नारियल तेल में मिलाकर पेस्ट बना लें। इस पेस्ट को बालों में लगाने से बालों का रंग आकर्षक डार्क-ब्राउन होने लगता है।

  • बाल धोने में नींबू पानी का उपयोग करें। इससे बाल नेचुरली ब्राउन होने लगते हैं ।

पेट की समस्या से हर घर में अधिकतर व्यक्ति परेशान होते हैं। पेट की मुख्‍य समस्‍याओं में कमजोर पाचन तंत्रकब्‍जगैस बनना हो सकता है। इनके लिए डॉक्‍टरी इलाज करने के साथ ही आप इन घरेलू नुस्‍खों को भी अपना सकते हैं। आज हम आपको पेट की आम समस्‍याओं के लिए इलाज के लिए घरेलू चीजों से बनने वाले 4 चूर्ण के बारे में बता रहे हैं। इनके प्रयोग से कई रोगों से मुक्त हो सकते है।

गैस हर चूर्ण :

सामग्री

·       10 ग्राम सेंधा नमक

·       10 ग्राम हींग

·       10 ग्राम सज्जीखार ( शुद्ध )

·       10 ग्राम हरड़ छोटी

·       10 ग्राम अजवायन

·       10 ग्राम काली मिर्च

चूर्ण बनाने की विधि

इस चूर्ण को बनाने के लिए उपर्युक्त  सामग्री को इक्कठा करें और अच्छी तरह से बारीक पीस लें। जब पाउडर बन जाए तो उसे किसी बारीक कपड़े या छन्‍नी से छान कर किसी कांच की शीशी में भरकर रख लें।

गैस और अपच के लिए :

सामग्री

·       जीरा 120 ग्राम 

·       सेंधानमक 100 ग्राम 

·       धनिया 80 ग्राम

·       कालीमिर्च 40 ग्राम 

·       सोंठ 40 ग्राम

·       छोटी इलायची 20 ग्राम

·       पीपर छोटी 20 ग्राम 

·       नींबू सत्व 15 ग्राम 

·       खाण्ड देशी 160 ग्राम

चूर्ण बनाने की विधि

नींबू और खाण्‍ड को छोड़ कर बाकी की सभी सामग्रियों को पीस कर चूर्ण तैयार करें।  फिर उसमें नींबू निचोड़े और खाण्‍ड मिलाएं। इस मिश्रण को 3 घंटे के लिये एक कांच के बरतन में रख दें।  फिर इसका सेवन खाना खाने के बाद 2 से 5 ग्राम करें।

कब्‍ज निवारक चूर्ण

सामाग्री

·       जीरा

·       अजवाइन

·       काला नमक

·       मेथी

·       सौंफ

·       हींग

चूर्ण बनाने की विधि

सबसे पहले जीराअजवाइनमेथी और सौंफ को अलग-अलग धीमी आंच पर भून लें। भूनने के बाद इन्‍हें अलग-अलग बारीक पीस लें। इसके बाद एक बर्तन में काला नमक और आधा चम्‍मच हींग लें। अब इसमें जीरासौंफअजवाइन का पाउडर डाल लें। इन तीनों से कम मात्रा में मेथी पाउडर डालें। इस मिश्रण को अच्‍छी तरह मिला लें। ध्‍यान ये रखना है कि जीराअजवाइन और सौंफा की मात्रा समान होनी चाहिए। इसको अच्‍छी तरह से मिक्‍स करने के बाद किसी डिब्‍बे में रख लें।

 

पेट के लिए रामबाण है यह चूर्ण

खाना खाने के बाद कई लोगों को बदहजमी हो जाती है। कभी-कभी तो पेट दर्द बर्दाशत से बाहर हो जाता है।इस चूर्ण से पाचन क्रिया ठीक रहती है।

सामग्री

·       अनारदाना 10 ग्राम

·       छोटी इलायची 10 ग्राम

·       दालचीनी 10 ग्राम

·       सौंठ 20 ग्राम

·       पीपल 20 ग्राम

·       कालीमिर्च 20 ग्राम

·       तेजपत्ता 20 ग्राम

·       पीपलामूल 20 ग्राम

·       नींबू का सत्व 20 ग्राम

·       धनिया 40 ग्राम

·       सेंधा नमक 50 ग्राम

·       काला नमक 50 ग्राम

·       सफेद नमक 50 ग्राम

·       मिश्री की डली 350 ग्राम

चूर्ण बनाने की विधि

सेंधा नमककाला नमकसफेद नमकमिश्री और नींबू का सत्व को छोड़कर सभी सामान को कड़ी धूप में 2-3 घण्टे सुखा लें। फिर इसे मिक्सी में डालकर बारीक पीस लें।

इसके बाद बाकी सामान को अलग से बारीक पीस लें और फिर सभी सामानों के इस पाउडर को अच्छे से मिला लें। अब इसे किसी कांच की शीशी भरकर रख लें।

 

COVID-19 के मामले भारत में बढ़ रहे हैं, और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे महामारी की स्थिति के रूप में घोषित किया है, इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमें संक्रमणों के खिलाफ खुद को सुरक्षित करने की आवश्यकता है। 
आयुर्वेद के अनुसार, यहां कुछ घरेलू उपचार दिए गए हैं, जिन्हें अपनाकर आप अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकते हैं। 
* आयुर्वेदिक तैयारी, च्यवनप्राश: हम च्यवनप्राश खाने की प्रथा में रहे हैं। एंटीऑक्सिडेंट से भरपूर आवश्यक जड़ी बूटियों से भरी इस आयुर्वेदिक तैयारी का एक चम्मच कई लोगों के जीवन में एक दिनचर्या है। च्यवनप्राश एक व्यापक हर्बल टॉनिक है जिसमें कई स्वास्थ्य लाभ हैं, जो एक प्राचीन आयुर्वेदिक सूत्र के अनुसार तैयार किया गया है। आज दुनिया भर में लोगों द्वारा उपयोग किया जाता है, यह एक सिद्ध एनर्जाइज़र, प्रतिरक्षा बूस्टर और पूर्व-खाली टॉनिक है। यह प्रतिरक्षा के निर्माण के लिए एक सबसे अच्छा आयुर्वेदिक उपचार माना जाता है। 
* तुलसी अदरक की चाय: एक लीटर पानी में 1 बड़ा चम्मच सूखे अदरक, 4 चम्मच धनिया के बीज, 1 चम्मच काली मिर्च, 4 इंच गिलोय की छड़ी और एक मुट्ठी ताजा तुलसी के पत्तों को उबालें। इसे तनाव और 1 चम्मच शहद या गुड़ के साथ पीएं। 
* दालचीनी और क्रिस्टल चीनी / खांड / शहद के साथ लहसुन का दूध: एक गिलास दूध में चार गिलास पानी मिलाएं और इसमें तीन लौंग डालें। इसे एक गिलास तक कम होने तक उबालें। इसे दालचीनी के साथ शहद / चीनी / खांड के साथ चाय / कॉफी के बजाय इसे पीएं। 
* हल्दी छाछ: हल्दी पाउडर में 1 चम्मच, हींग पाउडर, मेथी और सौंफ के बीज को कुछ करी-पत्तियों के साथ 500 मिलीलीटर छाछ में मिलाएं और इसे पांच मिनट के लिए गर्म करें। रोजाना दो या तीन बार पिएं। ये सभी मनगढ़ंत बातें (क्वाथ / कड़ा) आपके चयापचय पर काम करते हैं, जो हमारी प्रतिरक्षा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा, अदरक-लहसुन-मिर्च पेस्ट को अपने करी / उपमा / ग्रेवी / बल्लेबाज में जोड़ने का प्रयास करें। 
* सफाई क्रिया के लिए अपने शरीर में अच्छे जलयोजन स्तर को बनाए रखें। * अपने प्रोबायोटिक्स सेवन को बढ़ाएं - एक दिन में कम से कम 2 सर्विंग दही लेने की सलाह दी जाती है। 
* विटामिन सी वायरल क्रिया के खिलाफ एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, इसलिए शरीर में इस महत्वपूर्ण विटामिन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए नींबू / कीवी / संतरे / मीठा चूना / आंवला- (भारतीय करौदा) का सेवन अच्छा विकल्प है। 
*कुछ घर-आधारित वर्कआउट के साथ जारी रखना भी बहुत महत्वपूर्ण है। चूंकि अधिकांश क्षेत्र बंद हैं, इसलिए कई कर्मचारियों को घर से काम करने की अनुमति दी जा रही है। इन तनाव काल के माध्यम से प्राप्त करने के लिए, कोरोनावायरस के खिलाफ अपने परिवार की रक्षा करने में मदद करने के लिए इन युक्तियों को शामिल करना एक अच्छा विचार है। हमेशा याद रखें कि रोकथाम इलाज से बेहतर है। अब यह आपके हाथ में है कि आप क्या चुनना चाहते हैं। 
विशेष :- किसी भी आयुर्वेदिक औषधि के सेवन से पहले आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श अवश्य करे | यदि आपको हमारा यह लेख पसंद आया हो तो कृपया शेयर करे और कमेन्ट के माध्यम से हमे भी अवगत करवाए | 
धन्यवाद ! 
Phone No:- 8744808450 
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पुरुषो को होने वाले रोगों की आयुर्वेदिक औषधि 
जानिए पुरुषो के रोगों के इलाज में उपलब्ध आयुर्वेदिक औषधियों के बारे में | साथ ही यह जानिए की इन औषधियों का सेवन कैसे करें और क्या परहेज रखें |
इस लेख में निम्नलिखित बीमारियों के लिए आयुर्वेदिक औषधियां बताई गई है |
पुरुष बांझपन 
पेशाब में जलन 
पथरी, किडनी स्टोन
किडनी रोग
नपुंसकता 
सफेद पानी 
थैलेसीमिया 
पुरुषो के विभिन्न रोगों के इलाज 
आयुर्वेद में मूत्रक्कृच्छ्, पेशाब में जलन ( Dysuria ) का इलाज-
गोक्षुरादि गुग्गुलु – 60 ग्राम चन्द्रप्रभावटी – 40 ग्राम गिलोयघन वटी – 60 ग्राम 1-1 गोली दिन में 3 बार प्रात: नाश्ते, दोपहर-भोजन एवं सायं भोजन के आधे घण्टे बाद सुखोष्ण (गुनगुने) जल से सेवन करें।
चन्दनासव – 450 मिली 4 चम्मच औषध में 4 चम्मच पानी मिलाकर प्रात: एवं सायं भोजन के बाद सेवन करें।
(Urolythiasis/ Stone in Bladder) पथरी, किडनी स्टोन का इलाज-
अश्मरीहर क्वाथ – 300 ग्राम 1 चम्मच औषधि को 400 मिली पानी में पकाएं और जब 100 मिली शेष रहने पर छानकर प्रात: सायं खाली पेट पिएं।
अश्मरीहर रस – 50 ग्राम 1-1 ग्राम औषधि को अश्मरीहर क्वाथ के साथ सेवन कराएं। गोक्षुरादि गुग्गुलु – 60 ग्राम चन्द्रप्रभा वटी – 60 ग्राम 1-1 गोली प्रात: व सायं भोजन के बाद सुखोष्ण (गुनगुने) जल से सेवन करें। नोट– पत्थरचट्टे का पत्ता रोज प्रात: खाली पेट चबाकर खाए।
किडनी, वृक्क की निष्क्रियता (CRF) एवं किडनी रोग का इलाज-
सर्वकल्प क्वाथ – 100 ग्राम + वृक्कदोषहर क्वाथ – 200 ग्राम + नीम छाल – 5 ग्राम + पीपल छाल 5 ग्राम सभी औषधियों को मिलाकर 1 चम्मच (लगभग 5–7 ग्राम) की मात्रा में लेकर 400 मिली पानी में पकाएं और 100 मिली शेष रहने पर छानकर प्रात:, सायं खाली पेट पियें।
गिलोयघन वटी – 60 ग्राम 2–2 गोली प्रात: व सायं खाली पेट सुखोष्ण (गुनगुने) जल से सेवन करें।
वसन्तकुसुमाकर रस – 1 ग्राम + गिलोय सत् -10 ग्राम + हजरुल यहूद भस्म – 10 ग्राम + पुनर्नवादि मण्डूर – 20 ग्राम + शवेत पर्पष्टी – 5 ग्राम सभी औषधियों को मिलाकर 60 पुड़ियां बनाएं। प्रात: नाश्ते एवं रात्रि-भोजन से आधा घण्टा पहले जल/शहद से सेवन करें।

गोक्षुरादि गुग्गुलु – 60 ग्राम चन्द्रप्रभा वटी – 60 ग्राम वृक्कदोषहर वटी – 60 ग्राम 1–1 गोली दिन में 2-3 बार प्रात: नाश्ते, दोपहर-भोजन एवं सायं भोजन के आधे – घण्टे बाद गुनगुने जल से सेवन करें।
नोट- उच्चरक्तचाप होने की स्थिति में मुक्तावटी की 1-1 या 2-2 गोली प्रात: एवं सायं खाली पेट पानी या काढ़े से लें।
नपुंसकता, शुक्राल्पता (Oligospermia , fertility ) नामर्दी का इलाज-
वसन्तकुसुमाकर रस – 1-3 ग्राम + त्रिवंगा भस्म – 5 ग्राम + अभ्रकं भस्म – 10 ग्राम + गिलोय सत् – 10 ग्राम + सिद्ध मकरध्वज – 2 ग्राम + प्रवाल पिष्टी – 10 ग्राम सभी औषधियों को मिलाकर 60 पुड़िया बनाएं। प्रात: नाश्ते एवं रात्रि-भोजन से आधा घण्टा पहले जल/शहद से सेवन करें।
शिलाजीत सत् – 20 ग्राम 2-2- बूँद दूध में मिलाकर सेवन करें।
यौवनामृत वटी – 5 ग्राम ,चन्द्रप्रभावटी- 40 ग्राम 2–2 गोली प्रात: व सायं भोजन के बाद दूध से सेवन करें।
अश्वगन्धा चूर्ण – 100 ग्राम, शतावरी चूर्ण – 100 ग्राम, श्वेतमूसली चूर्ण – 100 ग्राम
1- 1 चम्मच चूर्ण को प्रात: एवं सायं भोजन के बाद गुनगुने जल के साथ सेवन करें।
शुक्राल्पता में उपरोक्त औषधियों के साथ -कौंच, बीज – 250 ग्राम+ सफेद गुञ्जा – 250 ग्राम कौंच बीज तथा सफेद गुज्जा को कुटकर 1-1 चम्मच की मात्रा में प्रात: एवं सायं । दूध के साथ सेवन करने पर शुक्राणुओं की वृद्धि तथा शरीर का पोषण होता है। (कौंच बीज तथा सफेद गुञ्जा का प्रयोग शोधन के पश्चात् ही करना चाहिए । इसका शोधन दोला यन्त्र विधि से किया जाता है। बीजों को 1 पोटली में लटकाकर 4 ली दूध में पकाएं, जब पकते-पकते दूध गाढ़ा हो जाए तो पोटली को निकालकर, छिलका उतारकर बीजों को पीसकर कर सुरक्षित रख लें।
शुक्राणुहीनता, पुरुष बांझपन ( Azoospermia ) का इलाज-
हीरक भस्म – 300 मि.ग्राम + वसन्तकुसुमाकर रस – 2-3 ग्राम + दिव्य सिद्धमकरध्वज – 2–3 ग्राम सभी औषधियों को मिलाकर 60 पुड़ियां बनाएं। प्रात: नाश्ते एवं रात्रि-भोजन से आधा घण्टा पहले जल/शहद से सेवन करें।
प्रमेह तथा शुक्रमेह, धातु गिरना  और सफेद पानी का इलाज-
सर्वकल्प क्वाथ – 100 ग्राम+ वृक्कदोषहर क्वाथ – 200 ग्राम , दोनों औषधियों को मिलाकर 1 चम्मच (लगभग 5-7 ग्राम) की मात्रा में लेकर 400 मिली पानी में पकाएं और 100 मिली शेष रहने पर छानकर प्रात:, सायं खाली पेट पिएं।
गिलोयघन वटी – 60 ग्राम 2-2 गोली उपरोक्त क्वाथ से सेवन करें।
आंवला चूर्ण – 100 ग्राम +वंगभस्म – 5 ग्राम +प्रवाल पंचामृत – 5 ग्राम +हजरुल यहूद भस्म – 5 ग्राम + गिलोय सत् – 20 ग्राम सभी औषधियों को मिलाकर 1-1 चम्मच प्रात:, नाश्ते एवं रात्रि-भोजन से आधा घण्टा पहले जल/शहद से सेवन करें।
गोक्षुरादि गुग्गुलु – 60 ग्राम , चन्द्रप्रभावटी – 60 ग्राम, शिलाजीत रसायन वटी – 60 ग्राम 1-1 गोली दिन में 3 बार प्रात: नाश्ते, दोपहर-भोजन एवं सायं भोजन के आधे घण्टे बाद जल से सेवन करें।
अन्य व्याधिष्य थैलेसीमिया (Thalessemia) का इलाज-
सर्वकल्प क्वाथ – 300 ग्राम 1 चम्मच औषध को 400 मिली पानी में पकाएं और 100 मिली शेष रहने पर छानकर प्रात:, सायं खाली पेट पिएं। कुमारकल्याण रस – 1-2 ग्राम+ प्रवाल पिष्टी – 5 ग्राम +कहरवा पिष्टी – 5 ग्राम + मुक्ता पिष्टी – 5 ग्राम +गिलोयसत् – 10 ग्राम + प्रवालपंचामृत – 5 ग्राम सभी औषधियों को मिलाकर 60 पुड़ियां बनाएं। प्रात: नाश्ते एवं रात्रि-भोजन से आधा घण्टा पहले जल/शहद से सेवन करें।
कैशोर गुग्गुल – 40 ग्राम + आरोग्यवर्धिनी वटी – 20 ग्राम 1–1 गोली प्रात: व सायं भोजन के बाद गुनगुने जल से सेवन करें। धृतकुमारी स्वरस – 10 मिली + गिलोय स्वरस – 10 मिली इसमें (उपरोक्त दोनों स्वरसों में) गेंहूँ के ज्वारे का रस मिलाकर प्रात: एवं सायं खाली पेट सेवन करें।
Disclaimer – यह जानकारी केवल आपके ज्ञान वर्धन और जागरूकता के लिए है | इसे बताने का औचित्य सिर्फ आपको इस बारे में जागरूक बनाना है | बिना चिकित्सक के परामर्श के दवाइयों का सेवन नहीं करना चाहिए | Never Take Medicines without Consulting the Doctor.
नमस्कार दोस्तों एकबार फिर से आपका Ayurvedic Upchar में स्वागत है आज हम आपको ऐसी औषध के बारे में बताएँगे जो शरीर के अँगो को पुनः नया जीवन दे सकती है, जो कैन्सर के मरीज़ों के लिए आयुर्वेद जगत की संजीवनी है जिसका नाम पुनर्नवा है। पुर्ननवा संस्कृत के दो शब्द पुनः अर्थात ‘फिर’ और नव अर्थात ‘नया’ से बना है। पुर्ननवा औषधि में भी अपने नाम के अनुरूप ही शरीर को पुनः नया कर देने वाले गुण पाए जाता है। इसलिए इसे रोगों से लड़ने से लेकर कैंसर के इलाज तक में उपयोग किया जाता है।
इसकी 1 चम्मच भोजन के साथ अर्थात सब्जी में मिलाकर सेवन करने से बुढापा नही आता अर्थात बूढ़ा व्यक्ति भी जवाँ बना रहता है क्योंकि इससे शरीर के सभी अंग का पुनः नयी कोशिका का निर्माण होता रहता है। "शरीर पुनर्नवं करोति इति पुनर्नवा" जो अपने रक्तवर्धक एवं रसायन गुणों द्वारा सम्पूर्ण शरीर को अभिनव स्वरूप प्रदान करे, वह है ‘पुनर्नवा’। यह हिन्दी में साटी, साँठ, गदहपुरना, विषखपरा, गुजराती में साटोड़ी, मराठी में घेटुली तथा अंग्रेजी में ‘हॉगवीड’ नाम से जानी जाती है।
मूँग या चने की दाल मिलाकर इसकी बढ़िया सब्जी बनती है, जो शरीर की सूजन, मूत्ररोगों (विशेषकर मूत्राल्पता), हृदयरोगों, दमा, शरीरदर्द, मंदाग्नि, उलटी, पीलिया, रक्ताल्पता, यकृत व प्लीहा के विकारों, बुढ़ापे को रोकता है, जवाँ बनाएंआदि में फायदेमंद है। इसके ताजे पत्तों के 15-20 मि.ली. रस में चुटकी भर काली मिर्च व थोड़ा-सा शहद मिलाकर पीना भी हितावह है । भारत में यह सब्जी सर्वत्र पायी जाती है।
पुनर्नवा का शरीर पर होने वाला रसायन कार्य :
दूध, अश्वगंधा आदि रसायन द्रव्य रक्त-मांसादि को बढ़ाकर शरीर का बलवर्धन करते हैं परंतु पुनर्नवा शरीर में संचित मलों को मल-मूत्रादि द्वारा बाहर निकालकर शरीर के पोषण का मार्ग खुला कर देती है ।बुढ़ापे में शरीर में संचित मलों का उत्सर्जन यथोचित नहीं होता । पुनर्नवा अवरूद्ध मल को हटाकर हृदय, नाभि, सिर, स्नायु, आँतों व रक्तवाहिनियों को शुद्ध करती है, जिससे मधुमेह, हृदयरोग, दमा, उच्च रक्तदाब आदि बुढ़ापे में होनेवाले कष्टदायक रोग उत्पन्न नहीं होते। यह हृदय की क्रिया में सुधार लाकर हृदय का बल बढ़ाती है । पाचकाग्नि को बढ़ाकर रक्तवृद्धि करती है । विरूद्ध आहार व अंग्रेजी दवाओं के अतिशय सेवन से शरीर में संचित हुए विषैले द्रव्यों का निष्कासन कर रोगों से रक्षा करती है।

बाल रोगों में लाभकारी पुनर्नवा शरबत :
पुनर्नवा के पत्तों के 100 ग्राम स्वरस में मिश्री चूर्ण 200 ग्राम व पिप्पली (पीपर) चूर्ण 12 ग्राम मिलाकर पकायें तथा चाशनी गाढ़ी हो जाने पर उसको उतार के छानकर शीशी में रख लें । इस शरबत को 4 से 10 बूँद की मात्रा में (आयु अनुसार) रोगी बालक को दिन में तीन-चार बार चटायें । खाँसी, श्वास, फेपडों के विकार, बहुत लार बहना, जिगर बढ़ जाना, सर्दी-जुकाम, हरे-पीले दस्त, उलटी तथा बच्चों की अन्य बीमारियों में बाल-विकारशामक औषधि कल्प के रूप में इसका उपयोग बहुत लाभप्रद है ।

पुनर्नवा के 25 चमत्कारी फायदे :

  1. पुनर्नवा रक्तशोधन में उपयोग किया जाता है। यह रक्त से विषैले पदार्थों को दूर कर कई रोगों को नष्ट कर देता है।
  2. पुनर्नवा का उपयोग जोड़ों के दर्द से निजात दिलाता है। यह किसी भी तरह के आर्थराइटिस में उपयोगी साबित होता है।
  3. पुनर्नवा शरीर को ऊर्जा देता है। यह मांसपेशियों को मज़बूत कर कमज़ोरी और दुबलापन दूर करता है।
  4. पुनर्नवा पेट से जुडी बीमारियों को दूर करता है। आँतों में ऐठन, अपच और पेट में ज़रूरी अम्लों की कमी जैसे रोगों में यह जल्द आराम दिलाता है।
  5.  किसी भी तरह के चर्मरोग जैसे दाग, धब्बे, छाई , चोट के निशान आदि पर पुनर्नवा के जड़ को पीस कर लेप बनाकर लगाएं। कुछ ही दिनों में आप रोग को दूर होता पाएंगे।
  6. पुनर्नवा उपयुक्त वज़न बनाये रखने में मदद करता है। यह अतरिक्त वसा कम करता है तथा दुबलेपन को भी दूर करता है।
  7. पुनर्नवा का नियमित सेवन मूत्रप्रवाह को सुचारू कर शरीर को स्वस्थ और स्वच्छरखता है। यह कोशिकाओं में तरल पदार्थ के प्रवाह को भी बेहतर करता है।
  8. ये कैन्सर के मरीज़ों के लिए आयुर्वेद जगत की सबसे अद्भुत औषधि है क्यूँकि ये नयी कोशिकाएँ बनाती है। ये नयी कोशिकाएँ कैन्सर से लड़ने में शक्ति प्रदान करती है। 
  9. पैरालिसिस, शरीर के किसी विशेष हिस्से का सुन्न पड़ना और मांसपेशियों में कमज़ोरी आना जैसी समस्याएं भी पुनर्नवा के सेवन से दूर होती है।
  10. नेत्रों की फूलीः पुनर्नवा की जड़ को घी में घिसकर आँखों में आँजें।
  11. नेत्रों की खुजलीः पुनर्नवा की जड़ को शहद या दूध में घिसकर आँख में आँजें।
  12. नेत्रों से पानी गिरनाः पुनर्नवा की जड़ को शरहद में घिसकर आँखों में आँजें।
  13. पेट के रोगः गोमूत्र एवं पुनर्नवा का रस समान मात्रा में मिलाकर पीयें।
  14. पेट की गैसः 2 ग्राम पुनर्नवा के मूल का चूर्ण, आधा ग्राम हींग व 1 ग्राम काला नमक गर्म पानी से लें।
  15. मूत्रावरोधः पुनर्नवा का 40 मि.ली. रस अथवा उतना ही काढ़ा पीयें पुनर्नवा के पत्ते बाफकर पेडू पर बाँधें । 1 ग्राम पुनर्नवाक्षार (आयुर्वेदिक औषधियों की दुकान से मिलेगा) गर्म पानी के साथ पीने से तुरंत फायदा होता है।
  16. पथरीः पुनर्नवा की जड़ को दूध में उबालकर सुबह-शाम पीयें । 6. सूजनः पुनर्नवा की जड़ का काढ़ा पिलाने एवं सूजन पर जड़ को पीसकर लेप करने से लाभ होता है।
  17. पीलियाः पुनर्नवा के पंचांग (जड़, छाल, पत्ती, फूल और बीज) को शहद एवं मिश्री के साथ लें अथवा उसका रस या काढ़ा पीयें।
  18. पागल कुत्ते का विषः सफेद पुनर्नवा के मूल का 25 से 50 ग्राम घी में मिलाकर रोज पीयें।
  19. फोड़ाः पुनर्नवा के मूल का काढ़ा पीने से कच्चा अथवा पका हुआ फोड़ा भी मिट जाता है।
  20. अनिद्राः पुनर्नवा के मूल का 100 मि.ली. काढ़ा दिन में 2 बार पीयें।
  21. संधिवातः पुनर्नवा के पत्तों की सब्जी सोंठ डालकर खायें।
  22. एड़ी में वायुजन्य वेदना होती हो तो ‘पुनर्नवा तेल’ एड़ी पर घिसें व सेंक करें।
  23. खूनी बवासीरः पुनर्नवा के मूल को पीसकर फीकी छाछ (200 मि.ली.) या बकरी के दूध (200 मि.ली.) के साथ पीयें।
  24. हृदयरोगः हृदयरोग के कारण सर्वांग सूजन हो गयी तो पुनर्नवा के मूल का 10 ग्राम चूर्ण और अर्जुन की छाल का 10 ग्राम चूर्ण 200 मि.ली. पानी में काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीयें।
  25. दमाः 10 ग्राम भारंगमूल चूर्ण और 10 ग्राम पुनर्नवा चूर्ण को 300 मि.ली. पानी में उबालकर काढ़ा बनायें । 50 मि.ली. बचे तब सुबह-शाम पीयें।
 लवण भास्कर चूर्ण
आयुर्वेद में लवण भास्कर चूर्ण खाने को पचाने में एक बेहतरीन योग मना जाता है इसे सर्वप्रथम आचार्य भास्कर ने बनाया था. आयुर्वेद को अनेक संज्ञाएँ दी जाती है जैसेकि आयुर्वेद को जीवन का वेद माना जाता है क्योकि ये व्यक्ति को निरोगी रखने के योगों से भरा हुआ है, साथ ही आयुर्वेद हमे हमेशा ये शिक्षा देता है कि निरोगी कैसे रहा जाएँ और अगर कभी कोई रोग शरीर को शिकार बना भी ले तो उसे दूर कैसे किया जाए. आयुर्वेदिक उपचारों की सबसेख़ास बात ये होती है कि उनसे किसी तरह का साइड इफ़ेक्ट नहीं होता. आज आपको एक ऐसे ही आयुवेदिक औषधि से परिचित कराने जा रहे है जो स्वास्थ्य और पाचन तंत्र के लिए काफी लाभदायी  है, जिसे लवण भास्कर चूर्ण के नाम से भी जाना जाता हैं ! इसे आप अपने घर में भी बना सकते हैं अगर आपको आयुर्वेद का ज्ञान हो

लवण भास्कर चूर्ण की खासियत ( Importance of Lavan Bhaskar Churn ) :
इसकी सबसे ख़ास बात ये है कि ये निरापद  है जिसे 1 से 3 ग्राम की मात्रा में लेने पर व्यक्ति की सभी पेट सम्बन्धी समस्याएं दूर हो जाती है. इस औषधि का प्रयोग काँजी, पानी और दही के साथ लिया जाता है किन्तु मट्ठा के साथ लेने पर इसका सर्वाधिक लाभ मिलता है.

लवण भास्कर चूर्ण कैसे करे इस्तेमाल ?
अगर इस चूर्ण को रात के समय गर्म पानी के साथ लिया जाए तो खुलकर शौच आता है, जिससे कब्ज में राहत मिलती है. वहीँ अगर इस चूर्ण में समान मात्रा में पंचसकार चूर्ण मिलाकर प्रयोग किया जाए तो ये दस्त तक लगा देता है जिससे दिन में 3 से 4 बार दस्त आते है और पेट पूरी तरह साफ़ हो जाता है.
इसका सेवन त्वचा सम्बन्धी सभी रोगों से निजात पाने और आम वात रोगों को दूर करने के लिए भी होता है इसके  बेनिफिट्स. भूख बढाने, पेट की वायु को बाहर निकलने, डकार इत्यादि में भी इस चूर्ण का इस्तेमाल फायदेमंद रहता है.

तो आइये जाने इसके बनाने की बिधि एवं सामग्री 
कैसे बनाएं लवण भास्कर चूर्ण ( How to Prepare Lavan Bhaskar Churn ) :
  • - 96 ग्राम : समुद्री नमक
  • - 48 ग्राम : अनार दाना
  • - 24 ग्राम : विडनमक
  • - 24 ग्राम : सेंधा नमक
  • - 24 ग्राम : पीपल
  • - 24 ग्राम : काला जीरा
  • - 24 ग्राम : पिपलामुल
  • - 24 ग्राम : तेजपत्ता
  • - 24 ग्राम : तालीस पत्र
  • - 24 ग्राम : नागकेशर
  • - 24 ग्राम : अम्लवेत
  • - 12 ग्राम : जीरा
  • - 12 ग्राम : काली मिर्च
  • - 12 ग्राम : सौंठ
  • - 06 ग्राम : इलायची
  • - 06 ग्राम : दालचीनी
घर पर बनायें लवण भास्कर पाउडर
सबसे पहली बात तो ये कि उपरलिखित सारी सामग्री किसी भी पंसारी के पास आसानी से मिल जायेगी. इनसे चूर्ण बनाने के लिए आप सबसे पहले सभी सामग्री को छान लें और उसमें नीम्बू का रस मिलाएं. अब इस मिश्रण को छाया में सुखाएं, इस प्रक्रिया को भावना देना भी कहा जाता है. बस इतना मात्र करने से ही आपका लवण भास्कर चूर्ण तैयार हो जाता है.

सावधानिया ( Cautions ) : इस चूर्ण को लेते वक़्त आपको ध्यान रखना है कि उच्च रक्तचाप रोगी और गुर्दे के रोगों से परेशान व्यक्ति इसका सेवन ना करें. डॉक्टर के सलाह से ही सेवन करे

नोट : कोई भी व्यक्ति आयुर्वेदिक औषधि बिना डॉक्टर के परामर्श के न ले ! क्योकि हर केस में मरीज़ के लक्षण अलग अलग होते हैं जिसका साइड इफ़ेक्ट भी हो सकता हैं – अगर आपको चिकिसकीय परामर्श चाहिए तो संपर्क करे ! आप हमे कॉल कर सकते हैं ! हमारा नंबर हैं - +91-8744808450, Whatsapp- +91 9911686262

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