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 1. पानी में अदरक, काली मिर्च, काला नामक, तुलसी के पत्ते डालकर अच्छे से उबाल लीजिये और इस पानी को थोड़ा ठंडा करके गरारे कीजिये इससे आवाज़ सुरीली होती है

2. अदरक को नमक और निम्बू के पानी में डालकर सुखा लीजिये और दिन में दो से तीन बार खाइए इससे आपकी आवाज़ पर अच्छा असर होता है.

3. दूध में मिश्री और सौंफ डालकर पीने से गले को आराम मिलता है.

4. आवाज़ सुरीली करने के लिए दूध में आधा चम्मच शहद डालकर रोजाना पीजिये इससे आवाज़ सुरीली होती है.

5. आप जामुन की गुठलियों में थोड़ी काली मिर्च डालकर उसमे शहद मिलाएं और इसका सेवन करें. इससे जल्द ही आपकी आवाज़ सुरीली हो जाती है.

6. सोने से पहले गर्म पानी के गरारे कीजिये.

7. 2-2 ग्राम मुलहठी, आँवले और मिश्री का 20 से 50 मिलिलीटर काढ़ा देने से या भोजन के पश्चात् 1 ग्राम काली मिर्च के चूर्ण में घी डालकर चटाने से लाभ होता है।

8. आवाज सुरीली बनाने के लिए 10 ग्राम बहेड़ा की छाल को गोमूत्र में भावित कर चूसने से आवाज एकदम सुरीली होती है।

9. आवाज सुरीली करने के लिए घोड़ावज का आधा या 1 ग्राम चूर्ण 2 से 5 ग्राम शहद के साथ लेने से लाभ होता है।

10. कच्चा सुहागा आधा ग्राम मुंह में रखें और उसका रस चुसते रहें। दो तीन घण्टों मे ही गला बिलकुल साफ हो जाएगा।

11. जिन व्यक्तियों के गले में निरंतर खराश रहती है या जुकाम में एलर्जी के कारण गले में तकलीफ बनी रहती है, वह सुबह-शाम दोनों वक्त चार-पांच मुनक्का के दानों को खूब चबाकर खा लें, लेकिन ऊपर से पानी ना पिएं। दस दिनों तक लगातार ऐसा करने से लाभ होगा।

 www.ayurvedicupchar.org

आजकल के भागदौड़ एवं तनाव भरी जीवन शैली के कारण असमय बाल सफेद हो जाते हैं। बाल डाई करना इस समस्या का एकमात्र विकल्प नहीं। कुछ घरेलू नुस्खे आजमा कर भी सफेद बालों को काला किया जा सकता है। जोकि सर्वथा हानिरहित एवं निरापद हैं।

इन उपायों से काला करें बाल :

  • 2 चम्मच मेंहदी पाउडर, 1 चम्मच दही, 1 चम्मच मेथी, 3 चम्मच कॉफी, 2 चम्मच तुलसी पाउडर, 3 चम्मच पुदीना पेस्ट मिलाकर बालों में लगाएं। तीन घंटे बाद शैम्पू करें। कम उम्र में सफेद हुए बाल फिर काले हो जाएंगे।

  • आंवला व आम की गुठली को पीसकर इस पेस्ट को प्रतिदिन - 30 मिनट सिर में लगाने से सफेद बाल काले होने लगते हैं ।

  • सूखे आंवले को पानी में भिगोकर उसका पेस्ट बना लें। इस पेस्ट में एक चम्मच युकेलिप्टस का तेल मिलाएं। मिश्रण को रात भर किसी लोहे के बर्तन में रखें। सुबह इसमें दही, नींबू का रस व अंडा मिलाकर बालों पर लगाएं। बालों में नई जान आ जाएगी। 15 दिन तक यह प्रयोग करने से सफेद बाल काले होने लगते हैं।

  • बादाम तेल, आंवला जूस व नींबू का जूस मिलाकर बालों की जड़ों में लगाएं बालों में चमक आ जाएगी व सफेद भी नहीं होंगे।

  • छोटी उम्र में सफेद होते बालों पर एक ग्राम काली मिर्च में थोड़ा दही मिलाकर सिर में लगाने से भी लाभ होता है।

  • 200 ग्राम आंवला, 200 ग्राम भांगरा, 200 ग्राम मिश्री, 200 ग्राम काले तिल इन सभी का चूर्ण बनाकर रोजाना 10 ग्राम मात्रा में लेने से कम उम्र में सफेद हुए बाल फिर से काले होने लगेंगे।

  • शीघ्र लाभ के लिए गाय के दूध का मक्खन या घी लेकर हल्के हाथों से बालों की जड़ों में लगाएं।सिर की त्वचा को पोषण मिलता है एवं बालों के सफेद होने की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है।

  • अदरक को पीसकर उसमें थोड़ा शहद मिलाकर पेस्ट बनाएं और अपने सिर पर लगाएं। इस उपाय को रोजाना अपनाने से सफेद बाल फिर से काले होने लगते हैं।

  • नारियल तेल में ताजे आंवला को इतना उबाले कि वह काला हो जाए। इस मिश्रण को ठंडा करके रात को सोने से पहले बालों में लगा लें व सुबह बाल धोएं।

  • नारियल तेल में मीठे नीम की पत्तियां को इतना उबाले की पत्तियां काली हो जाएं। इस तेल के हल्के हाथों से बालों की जड़ों पर लगाएं। बाल घने व काले हो जाएंगे।
 

बाल झड रहे हैं तो इन्हें आजमायें :

  • बालों में एलोवेरा जेल लगाने से भी बाल गिरना बंद हो जाते हैं और जल्दी सफेद नहीं होते।

  • प्रतिदिन प्रातः खाली पेट 20 मिली. आंवला जूस लेने से भी बाल लंबी उम्र तक काले बने रहते हैं एवं झड़ते भी नहीं हैं ।


बालों का रंग डार्क ब्राउन करने के लिए :

  • मेहंदी को नारियल तेल में मिलाकर पेस्ट बना लें। इस पेस्ट को बालों में लगाने से बालों का रंग आकर्षक डार्क-ब्राउन होने लगता है।

  • बाल धोने में नींबू पानी का उपयोग करें। इससे बाल नेचुरली ब्राउन होने लगते हैं ।

यदि डिप्रैशन की चपेट में आ रहे हैं तो इसे करें ! हमारा मष्तिस्क जो सम्पूर्ण  शरीर का नियंत्रण करता है करोड़ों छोटी-छोटी कोशिकाओं का बना है, उन्हें न्यूरोन्स कहा जाता है |  एक न्यूरोन दूसरे न्यूरोन्स से संपर्क कुछ खास पदार्थों के जरिए करता है, इन पदार्थों को न्यूरोट्रांसमीटर कहा जाता है | दिमाग में कुछ ऐसे न्यूरोट्रांसमीटर हैं जिनकी मात्रा में बदलाव आने से डिप्रैशन हो जाता है |  समय के साथ डिप्रैशन बढ़ने से दिमाग की कोशिकाओं में ऐसे बदलाव आ जाते हैं, जिनसे रोगी के मन में स्वयं को खत्म करने के विचार आने लगते हैं | 

डिप्रैशन के लक्षण :

•यदि आप सो नहीं पाते हैं अथवा ज्यादा सोने लगते हैं

•किसी भी चीज पर उतना ध्यान नहीं लगा पाते जो कि आप पहले आसानी से कर पाते थे

•उदास व निराश रहते हैं, प्रयास करने के बाबजूद भी अपने मन से नकारात्मकता को निकाल नहीं पा रहे हैं

•भूख नहीं लगती या जरूरत से ज्यादा खाने लगे हैं

•जरूरत से ज्यादा परेशान, गुस्सैल या चिड़चिड़े रहने लगे हैं |

•शराब या धूम्रपान करने लगे हैं, या ऐसी किसी गतिविधि में शामिल हो रहे हैं जो कि आप जानते हैं कि वह गलत है

•मन में यह विचार आते हों कि जीवन जीने का कोई फायदा नहीं है यदि उपर्युक्त लक्षण उत्पन्न हो रहे हों तो सावधान हो जाएँ |

 

यह डिप्रैशन हो सकता है | डिप्रैशन अधिकतर  25 से 45 वर्ष की उम्र के लोग को प्रभावित करता है | परंतु बच्चों एवं वृद्धावस्था में भी यह बीमारी हो सकती है | पुरुषों की तुलना में महिलाओं में डिप्रैशन 2-3 गुना ज्यादा पाया जाता है | डिप्रैशन समाज के हर वर्ग को प्रभावित करता है | यह सोचना गलत है कि जिन लोगों के पास जिन्दगी के सब ऐशो-आराम हैं उन लोगों को डिप्रैशन नहीं हो सकता |

बच्चों में डिप्रैशन के लक्षण :

चिड़चिड़ापन, कहना न मानना, पढ़ाई में ध्यान न देना, स्कूल न जाने के बहाने बनाना |

डिप्रैशन की चिकित्सा : बदलती जीवनशैली, तनावमुक्त वातावरण और प्रदूषित पर्यावरण की वजह से भी अवसाद के मामले निरंतर बढ़ रहे हैं। योग में अवसाद के उपचार के लिए ब्रह्म मुद्रा आसन बहुत कारगर योगासन है। इसके नियमित अभ्यास से आपको न सिर्फ अवसाद से मुक्ति मिलती है बल्कि कई मानसिक व शारीरिक समस्याओं का भी निदान होता है।

आराम की मुद्रा में बैठ जाएँ. सर्वप्रथम श्वांसों को गहराई से छोड़ने का प्रयास करें । केवल सांसों को गहरा-गहरा लें और छोड़ें। इस प्रक्रिया में शरीर की दूषित वायु निष्कासित होती है और तन- मन प्रफुल्लित रहतें हैं ।

ब्रह्म मुद्रा करने की विधि :

•पद्मासन,वज्रासन,सिद्धासन या पालथी लगाकर बैठ जाएँ

•गर्दन को  श्वास भरते हुए धीरे-धीरे दाईं ओर ले जाएं। कुछ देर रुकें फिर श्वास छोड़ते हुए गर्दन को सामान्य स्थिति में ले आयें | पुनः श्वास भरते हुए गर्दन को बाईं ओर ले जाएं एवं श्वास छोड़ते हुए सामान्य स्थिति में लायें | यह एक चक्र हुआ | इस प्रकार कम से कम 5 चक्र करें |

•सिर को 3-4 बार क्लॉकवाइज (घडी की सुई की दिशा में) और उतनी ही बार एंटी क्लॉकवाइज घुमाएं।

 

सूर्य अनुलोम-विलोम प्राणायाम विधि :

पद्मासन अथवा सुखासन में बैठकर बायें नथुने को बंद करें और दायें नथुने से धीरे- धीरे अधिक से अधिक गहरा श्वास भरें। श्वास लेते समय आवाज न हो इसका ख्याल रखें। अब अपनी क्षमता के अनुसार श्वास भीतर ही रोक रखें। (कुंभक की यह अवधि कुछ दिनों के अभ्यास से धीरे धीरे एक डेढ़ मिनट तक बढ़ायी जा सकती है।) जब श्वास न रोक सकें तब दायें नथुने से ही धीरे धीरे बाहर छोड़ें। झटके से न छोड़ें। इस प्रकार 9 से 27 प्राणायाम करें।

घरेलू नुस्खे :

इलायची - इलायची के पिसे हुए बीज को पानी के साथ उबाल कर या चाय के साथ लिया जा सकता है।

काजू - विटामिन बी की मात्रा अधिक होने के कारण काजू हमारे स्वाद और तंत्रिका तंत्र को ठीक रखता है।

सेब - सेब खाने से डिप्रेशन दूर रहता है क्योंकि सेब में विटामिन बी ,फास्फोरस और पोटैशियम होते हैं जिनसे कि ग्लूटामिक एसिड का निर्माण होता है।

अवसाद की स्थिति में यह ध्यान रखें :

•महत्वपूर्ण निर्णयों को टालें जैसे कि शादी करना या तलाक से संबंधित बातें या नौकरी बदलना |

•अपने निर्णयों को अपने उन शुभचिंतकों के साथ बाटें, जो आपको भलीभांति जानते हों और आपकी स्थिति का सही आकलन करें |

•बड़े बड़े कार्यों को छोटे छोटे हिस्सों में बांटे, कुछ काम की प्राथमिकताएं निर्धारित करें और ऐसा कार्य करें, जिसे संपन्न करने की आपमें पूर्ण क्षमता हो |

•अन्य लोगों के साथ समय बिताएं और किसी भरोसेमंद मित्र या रिश्तेदार के साथ अपनी गुप्त बातों को बताएं |अपने आपको सबसे अलग थलग करने की कोशिश न करें और दूसरों को आपकी मदद करने दें |

•खुद को हल्के फुल्के कार्यों में या व्यायाम में व्यस्त रखें , ऐसे कार्य करें, जिसमे आपको आनंद मिले | जैसे कि फिल्म देखना, बाल्गेम खेलना |

•सामाजिक, धार्मिक या अन्य कार्यकमों में हिस्सा लें |

आधुनिक समय में इनफर्टिलिटी की समस्या बढ़ती जा रही है। ये समस्या महिलाओं एवं पुरुषों दोनों में होता है। बांझपन का मुख्य कारण शारीरिक संबंध, सेहत और उम्र  होती है। अगर महिला और पुरुष के बीच शारीरिक संबंध सही से स्थापित न हो, या फिर स्पर्म काउंट कम हो तो ऐसी स्थिति में इनफर्टिलिटी की समस्या का खतरा बढ़ जाता है।

वहीं, अगर सेहत सही हो तो स्पर्म काउंट भी सही रहता है। जिससे शारीरिक संबंध भी सही से स्थापित होता है। अगर सेहत ठीक न हो तो शरीर में स्पर्म काउंट का बैलेंस बिगड़ जाता है और स्पर्म काउंट में कमी आ जाती है। जिससे इनफर्टिलिटी की समस्या आ जाती है। इनफर्टिलिटी के लिए उम्र भी प्रमुख कारण है। 

अगर महिला और पुरुष के बीच उम्र में अधिक अंतर हो, या निर्धारित उम्र से अधिक उम्र में शारीरिक संबंध बनाया जाता है तो इस उम्र में स्पर्म काउंट सही नहीं रहता है। ऐसी स्थिति में महिला और पुरुष को इनफर्टिलिटी का सामना करना पड़ता है। वहीं, ये तीनों कारण महिलाओं पर भी लागू होता है। जिसमें अगर महिलाएं अधिक उम्र की हो जाती है तो एग सेल कम बनते हैं। जिससे इनफर्टिलिटी की समस्या आ जाती है। 

साथ ही महिलाओं में शारीरिक संबंध और सेहत इनफर्टिलिटी के लिए उतना ही जरूरी है, जितना पुरुष के लिए जरूरी है। अगर कोई दम्पत्ति संतान सुख से वंचित है तो आज हम आपको आयुर्वेद के जरिये कैसे महिला और पुरुष के बांझपन को दूर किया जा सकता है, इसके बारे में बताने जा रहे हैं। 

इनफर्टिलिटी के कारण- ( Reason of Increase fertility ) इनफर्टिलिटी के लिए जरूरी है कि महिला और पुरष के बीच भावनात्मक संबंध हो जो शारीरिक संबंध में एक साथ दिखे। अगर कोई मजबूरी में शारीरिक संबंध बनाता है तो ऐसी परिस्थिति में इनफर्टिलिटी की समस्या आती है। इसके लिए जरूरी है कि जब शारीरिक संबंध स्थापित हो तो दोनों के बीच भावनात्मक संबंध के तार भी जुड़े। प्रेग्नेंसी के लिए पुरुष शुक्राणु और महिला अंडाशय का गुणसूत्र मिलना चाहिए। ऐसा होने पर प्रेग्नेंसी के चांस बढ़ जाते हैं। अगर ऐसा नहीं होता है तो इनफर्टिलिटी की समस्या बनी रहती है। खान पान में तीखा, तला, नमकीन या प्रिजेटिव फ़ूड को खाने से पित्त बढ़ता है जो इनफर्टिलिटी को बढ़ाता है। 

पुरुषों में इनफर्टिलिटी के कारण- ( Increase fertility in men ) पुरुष में इनफर्टिलिटी के कई कारण होते हैं। जिसमें हार्मोन का असंतुलित होना, अत्यधिक स्मोकिंग, ड्रिंकिंग, वजन का असंतुलित होना, स्पर्म सेल का असंतुलित होना आदि। 

महिला में इनफर्टिलिटी के कारण- ( Increase fertility in women ) महिला में इनफर्टिलिटी के कई कारण होते हैं। जिसमें हार्मोन का बिगड़ना, अल्कोहल, स्मोकिंग, एग सेल कम प्रोड्यूस होना, ओवेल्यूशन प्रॉब्लम एवं ट्यूबल ब्लॉकेज ( tubal blockage )  आदि । 

आयुर्वेदिक उपचार-  ( Ayurvedic treatments to increase fertility ) फर्टिलिटी की समस्या को दूर करने के लिए जरूरी है कि महिला में एग सेल बनने के लिए पुरुष का स्पर्म काउंट नंबर सही हो। ऐसे में इस तालमेल को सही और सटीक स्थापित करने के लिए आयुर्वेद में कई उपचार है, जिसमें पंचकर्मा प्रमुख है। पंचकर्मा एक ऐसी आयुर्वेदिक पद्धति है। जिसमें टोक्सिन को बॉडी से डेटॉक्स किया जाता है। इसके साथ ही इस उपचार में विटामिन्स, मिनरल्स और हार्मोन्स को संतुलित किया जाता है। इसके लिए बॉडी को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन सप्लाई और बिना टोक्सिन वाली कोशिकाओं को पोषित करने पर ध्यान दिया जाता है। इसके अतिरिक्त बॉडी की इम्युनिटी लेवल को इंक्रीज किया जाता है। जिससे गर्भधारण में मदद मिलें। इस पद्धति में तीन सप्ताह का वक्त लगता है। 

अभ्यंग उपचार- इस उपचार में आयुर्वेदिक तेल का इस्तेमाल शरीर की मालिश के लिए किया जाता है।  इससे शरीर के सभी अंगों की आयुर्वेदिकक तरीके से मालिश कर शरीर में मौजूद कमियों को दूर किया जाता है। ये उपचार महिला और पुरुष दोनों के लिए है। 

स्नेहपनम उपचार- इस उपचार में शरीर में एग सेल और स्पर्म काउंट के लिए आयुर्वेदिक घी का इस्तेमाल किया जाता है। जिसमें महिला और पुरुष को घी पीने के लिए दिया जाता है। जिससे शारीरिक संबंध स्थापित करने की शक्ति बढ़ती है। साथ ही पाचन तंत्र भी मजबूत होता है। 

पोडिक्कजी उपचार- इस उपचार में महिला और पुरुष को इन्फर्टिलटी की समस्या को दूर करने के लिए आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों से बनाया गया चूर्ण खाने के लिए दिया जाता है। इस जड़ी बूटी से शारीरिक संबंध की स्पीड और ड्यूरेशन दोनों बढ़ता है। साथ ही ये दवा शरीर में मौजूद डेटॉक्स को बाहर करने में कारगर है। इस जड़ी बूटी में तनाव को दूर करने की भी अद्भुत शक्ति है। 

नजावरा उपचार- इस उपचार में प्राकृतिक रूप को अपनाया जाता है। इसके लिए एक पाक बनाया जाता है। जिसमें लाल पके चावल को दूध और जड़ी बूटी में मिलाकर बनाया जाता है। फिर इस पाक को सूती कपड़े में बांध दिया जाता है और इसके रस को तकरीबन आधे घंटे के लिए कन्धों और कमर पर निचोड़ा जाता है। इस रस से पूरे शरीर की मालिश की जाती है। इसके बाद आयुर्वेदिक तेल से शरीर की मालिश की जाती है। इस प्रक्रिया से गर्भ धारण की संभावना बढ़ जाती है। इसके साथ ही खान-पान पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। वहीं स्मोकिंग और ड्रिकिंग से भी दूर रहना जरूरी है। 

योग- इनफर्टिलिटी में योग भी बहुत लाभकारी होता है। इसके लिए योग चिकित्स्क कई आसनों का सुझाव देते हैं। जिसमें जानु शीर्षासन, उत्तानासन, पश्चिमोत्तानासन, भ्रामरी प्राणायाम और बद्ध कोणासन है। जिसे करने से इनफर्टिलिटी की समस्या दूर होती है। इन आसनों को करने से पेट, अंडाशय के साथ साथ प्रेग्नेंसी ऑर्गन्स की मसल्स को आराम मिलता है। साथ ही इनफर्टिलिटी में भी ये बहुत ही लाभकारी है। इन योगों को करने से स्ट्रेस और टैंशन दूर होता है। जिससे ओवरी हेल्दी रहता है। अगर ओवरी हेल्दी रहे तो एग सेल अधिक प्रोड्यूस होते हैं और फिर प्रेग्नेंट होने की संभावना बढ़ जाती है। प्रेग्नेंसी के लिए बॉडी में ब्लड का फ्लो होना बहुत जरूरी है और योग करने से बॉडी में ब्लड सर्कुलशन सही से होता है। जिससे सम्पूर्ण बॉडी को पोषण मिलता और भ्रूण विकास में यह फायदेमंद होता है ।

आयुर्वेद से इनफर्टिलिटी का इलाज सम्भव हैं । अगर कोई चिकित्सकीय परामर्श के अनुसार नियमित रूप से आयुर्वेद इलाज लेता हैं तो रोगी को सकारात्मक एवं स्थाई परिणाम मिलेंगे ।
COVID-19 के मामले भारत में बढ़ रहे हैं, और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे महामारी की स्थिति के रूप में घोषित किया है, इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमें संक्रमणों के खिलाफ खुद को सुरक्षित करने की आवश्यकता है। 
आयुर्वेद के अनुसार, यहां कुछ घरेलू उपचार दिए गए हैं, जिन्हें अपनाकर आप अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकते हैं। 
* आयुर्वेदिक तैयारी, च्यवनप्राश: हम च्यवनप्राश खाने की प्रथा में रहे हैं। एंटीऑक्सिडेंट से भरपूर आवश्यक जड़ी बूटियों से भरी इस आयुर्वेदिक तैयारी का एक चम्मच कई लोगों के जीवन में एक दिनचर्या है। च्यवनप्राश एक व्यापक हर्बल टॉनिक है जिसमें कई स्वास्थ्य लाभ हैं, जो एक प्राचीन आयुर्वेदिक सूत्र के अनुसार तैयार किया गया है। आज दुनिया भर में लोगों द्वारा उपयोग किया जाता है, यह एक सिद्ध एनर्जाइज़र, प्रतिरक्षा बूस्टर और पूर्व-खाली टॉनिक है। यह प्रतिरक्षा के निर्माण के लिए एक सबसे अच्छा आयुर्वेदिक उपचार माना जाता है। 
* तुलसी अदरक की चाय: एक लीटर पानी में 1 बड़ा चम्मच सूखे अदरक, 4 चम्मच धनिया के बीज, 1 चम्मच काली मिर्च, 4 इंच गिलोय की छड़ी और एक मुट्ठी ताजा तुलसी के पत्तों को उबालें। इसे तनाव और 1 चम्मच शहद या गुड़ के साथ पीएं। 
* दालचीनी और क्रिस्टल चीनी / खांड / शहद के साथ लहसुन का दूध: एक गिलास दूध में चार गिलास पानी मिलाएं और इसमें तीन लौंग डालें। इसे एक गिलास तक कम होने तक उबालें। इसे दालचीनी के साथ शहद / चीनी / खांड के साथ चाय / कॉफी के बजाय इसे पीएं। 
* हल्दी छाछ: हल्दी पाउडर में 1 चम्मच, हींग पाउडर, मेथी और सौंफ के बीज को कुछ करी-पत्तियों के साथ 500 मिलीलीटर छाछ में मिलाएं और इसे पांच मिनट के लिए गर्म करें। रोजाना दो या तीन बार पिएं। ये सभी मनगढ़ंत बातें (क्वाथ / कड़ा) आपके चयापचय पर काम करते हैं, जो हमारी प्रतिरक्षा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा, अदरक-लहसुन-मिर्च पेस्ट को अपने करी / उपमा / ग्रेवी / बल्लेबाज में जोड़ने का प्रयास करें। 
* सफाई क्रिया के लिए अपने शरीर में अच्छे जलयोजन स्तर को बनाए रखें। * अपने प्रोबायोटिक्स सेवन को बढ़ाएं - एक दिन में कम से कम 2 सर्विंग दही लेने की सलाह दी जाती है। 
* विटामिन सी वायरल क्रिया के खिलाफ एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, इसलिए शरीर में इस महत्वपूर्ण विटामिन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए नींबू / कीवी / संतरे / मीठा चूना / आंवला- (भारतीय करौदा) का सेवन अच्छा विकल्प है। 
*कुछ घर-आधारित वर्कआउट के साथ जारी रखना भी बहुत महत्वपूर्ण है। चूंकि अधिकांश क्षेत्र बंद हैं, इसलिए कई कर्मचारियों को घर से काम करने की अनुमति दी जा रही है। इन तनाव काल के माध्यम से प्राप्त करने के लिए, कोरोनावायरस के खिलाफ अपने परिवार की रक्षा करने में मदद करने के लिए इन युक्तियों को शामिल करना एक अच्छा विचार है। हमेशा याद रखें कि रोकथाम इलाज से बेहतर है। अब यह आपके हाथ में है कि आप क्या चुनना चाहते हैं। 
विशेष :- किसी भी आयुर्वेदिक औषधि के सेवन से पहले आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श अवश्य करे | यदि आपको हमारा यह लेख पसंद आया हो तो कृपया शेयर करे और कमेन्ट के माध्यम से हमे भी अवगत करवाए | 
धन्यवाद ! 
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नमस्कार दोस्तों एकबार फिर से आपका Ayurvedic Upchar में स्वागत है आज हम आपको ऐसी औषध के बारे में बताएँगे जो शरीर के अँगो को पुनः नया जीवन दे सकती है, जो कैन्सर के मरीज़ों के लिए आयुर्वेद जगत की संजीवनी है जिसका नाम पुनर्नवा है। पुर्ननवा संस्कृत के दो शब्द पुनः अर्थात ‘फिर’ और नव अर्थात ‘नया’ से बना है। पुर्ननवा औषधि में भी अपने नाम के अनुरूप ही शरीर को पुनः नया कर देने वाले गुण पाए जाता है। इसलिए इसे रोगों से लड़ने से लेकर कैंसर के इलाज तक में उपयोग किया जाता है।
इसकी 1 चम्मच भोजन के साथ अर्थात सब्जी में मिलाकर सेवन करने से बुढापा नही आता अर्थात बूढ़ा व्यक्ति भी जवाँ बना रहता है क्योंकि इससे शरीर के सभी अंग का पुनः नयी कोशिका का निर्माण होता रहता है। "शरीर पुनर्नवं करोति इति पुनर्नवा" जो अपने रक्तवर्धक एवं रसायन गुणों द्वारा सम्पूर्ण शरीर को अभिनव स्वरूप प्रदान करे, वह है ‘पुनर्नवा’। यह हिन्दी में साटी, साँठ, गदहपुरना, विषखपरा, गुजराती में साटोड़ी, मराठी में घेटुली तथा अंग्रेजी में ‘हॉगवीड’ नाम से जानी जाती है।
मूँग या चने की दाल मिलाकर इसकी बढ़िया सब्जी बनती है, जो शरीर की सूजन, मूत्ररोगों (विशेषकर मूत्राल्पता), हृदयरोगों, दमा, शरीरदर्द, मंदाग्नि, उलटी, पीलिया, रक्ताल्पता, यकृत व प्लीहा के विकारों, बुढ़ापे को रोकता है, जवाँ बनाएंआदि में फायदेमंद है। इसके ताजे पत्तों के 15-20 मि.ली. रस में चुटकी भर काली मिर्च व थोड़ा-सा शहद मिलाकर पीना भी हितावह है । भारत में यह सब्जी सर्वत्र पायी जाती है।
पुनर्नवा का शरीर पर होने वाला रसायन कार्य :
दूध, अश्वगंधा आदि रसायन द्रव्य रक्त-मांसादि को बढ़ाकर शरीर का बलवर्धन करते हैं परंतु पुनर्नवा शरीर में संचित मलों को मल-मूत्रादि द्वारा बाहर निकालकर शरीर के पोषण का मार्ग खुला कर देती है ।बुढ़ापे में शरीर में संचित मलों का उत्सर्जन यथोचित नहीं होता । पुनर्नवा अवरूद्ध मल को हटाकर हृदय, नाभि, सिर, स्नायु, आँतों व रक्तवाहिनियों को शुद्ध करती है, जिससे मधुमेह, हृदयरोग, दमा, उच्च रक्तदाब आदि बुढ़ापे में होनेवाले कष्टदायक रोग उत्पन्न नहीं होते। यह हृदय की क्रिया में सुधार लाकर हृदय का बल बढ़ाती है । पाचकाग्नि को बढ़ाकर रक्तवृद्धि करती है । विरूद्ध आहार व अंग्रेजी दवाओं के अतिशय सेवन से शरीर में संचित हुए विषैले द्रव्यों का निष्कासन कर रोगों से रक्षा करती है।

बाल रोगों में लाभकारी पुनर्नवा शरबत :
पुनर्नवा के पत्तों के 100 ग्राम स्वरस में मिश्री चूर्ण 200 ग्राम व पिप्पली (पीपर) चूर्ण 12 ग्राम मिलाकर पकायें तथा चाशनी गाढ़ी हो जाने पर उसको उतार के छानकर शीशी में रख लें । इस शरबत को 4 से 10 बूँद की मात्रा में (आयु अनुसार) रोगी बालक को दिन में तीन-चार बार चटायें । खाँसी, श्वास, फेपडों के विकार, बहुत लार बहना, जिगर बढ़ जाना, सर्दी-जुकाम, हरे-पीले दस्त, उलटी तथा बच्चों की अन्य बीमारियों में बाल-विकारशामक औषधि कल्प के रूप में इसका उपयोग बहुत लाभप्रद है ।

पुनर्नवा के 25 चमत्कारी फायदे :

  1. पुनर्नवा रक्तशोधन में उपयोग किया जाता है। यह रक्त से विषैले पदार्थों को दूर कर कई रोगों को नष्ट कर देता है।
  2. पुनर्नवा का उपयोग जोड़ों के दर्द से निजात दिलाता है। यह किसी भी तरह के आर्थराइटिस में उपयोगी साबित होता है।
  3. पुनर्नवा शरीर को ऊर्जा देता है। यह मांसपेशियों को मज़बूत कर कमज़ोरी और दुबलापन दूर करता है।
  4. पुनर्नवा पेट से जुडी बीमारियों को दूर करता है। आँतों में ऐठन, अपच और पेट में ज़रूरी अम्लों की कमी जैसे रोगों में यह जल्द आराम दिलाता है।
  5.  किसी भी तरह के चर्मरोग जैसे दाग, धब्बे, छाई , चोट के निशान आदि पर पुनर्नवा के जड़ को पीस कर लेप बनाकर लगाएं। कुछ ही दिनों में आप रोग को दूर होता पाएंगे।
  6. पुनर्नवा उपयुक्त वज़न बनाये रखने में मदद करता है। यह अतरिक्त वसा कम करता है तथा दुबलेपन को भी दूर करता है।
  7. पुनर्नवा का नियमित सेवन मूत्रप्रवाह को सुचारू कर शरीर को स्वस्थ और स्वच्छरखता है। यह कोशिकाओं में तरल पदार्थ के प्रवाह को भी बेहतर करता है।
  8. ये कैन्सर के मरीज़ों के लिए आयुर्वेद जगत की सबसे अद्भुत औषधि है क्यूँकि ये नयी कोशिकाएँ बनाती है। ये नयी कोशिकाएँ कैन्सर से लड़ने में शक्ति प्रदान करती है। 
  9. पैरालिसिस, शरीर के किसी विशेष हिस्से का सुन्न पड़ना और मांसपेशियों में कमज़ोरी आना जैसी समस्याएं भी पुनर्नवा के सेवन से दूर होती है।
  10. नेत्रों की फूलीः पुनर्नवा की जड़ को घी में घिसकर आँखों में आँजें।
  11. नेत्रों की खुजलीः पुनर्नवा की जड़ को शहद या दूध में घिसकर आँख में आँजें।
  12. नेत्रों से पानी गिरनाः पुनर्नवा की जड़ को शरहद में घिसकर आँखों में आँजें।
  13. पेट के रोगः गोमूत्र एवं पुनर्नवा का रस समान मात्रा में मिलाकर पीयें।
  14. पेट की गैसः 2 ग्राम पुनर्नवा के मूल का चूर्ण, आधा ग्राम हींग व 1 ग्राम काला नमक गर्म पानी से लें।
  15. मूत्रावरोधः पुनर्नवा का 40 मि.ली. रस अथवा उतना ही काढ़ा पीयें पुनर्नवा के पत्ते बाफकर पेडू पर बाँधें । 1 ग्राम पुनर्नवाक्षार (आयुर्वेदिक औषधियों की दुकान से मिलेगा) गर्म पानी के साथ पीने से तुरंत फायदा होता है।
  16. पथरीः पुनर्नवा की जड़ को दूध में उबालकर सुबह-शाम पीयें । 6. सूजनः पुनर्नवा की जड़ का काढ़ा पिलाने एवं सूजन पर जड़ को पीसकर लेप करने से लाभ होता है।
  17. पीलियाः पुनर्नवा के पंचांग (जड़, छाल, पत्ती, फूल और बीज) को शहद एवं मिश्री के साथ लें अथवा उसका रस या काढ़ा पीयें।
  18. पागल कुत्ते का विषः सफेद पुनर्नवा के मूल का 25 से 50 ग्राम घी में मिलाकर रोज पीयें।
  19. फोड़ाः पुनर्नवा के मूल का काढ़ा पीने से कच्चा अथवा पका हुआ फोड़ा भी मिट जाता है।
  20. अनिद्राः पुनर्नवा के मूल का 100 मि.ली. काढ़ा दिन में 2 बार पीयें।
  21. संधिवातः पुनर्नवा के पत्तों की सब्जी सोंठ डालकर खायें।
  22. एड़ी में वायुजन्य वेदना होती हो तो ‘पुनर्नवा तेल’ एड़ी पर घिसें व सेंक करें।
  23. खूनी बवासीरः पुनर्नवा के मूल को पीसकर फीकी छाछ (200 मि.ली.) या बकरी के दूध (200 मि.ली.) के साथ पीयें।
  24. हृदयरोगः हृदयरोग के कारण सर्वांग सूजन हो गयी तो पुनर्नवा के मूल का 10 ग्राम चूर्ण और अर्जुन की छाल का 10 ग्राम चूर्ण 200 मि.ली. पानी में काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीयें।
  25. दमाः 10 ग्राम भारंगमूल चूर्ण और 10 ग्राम पुनर्नवा चूर्ण को 300 मि.ली. पानी में उबालकर काढ़ा बनायें । 50 मि.ली. बचे तब सुबह-शाम पीयें।
कफ एक ऐसी संरचनात्मक अभिव्यक्ति है जो द्रव्यमान को दर्शाता है यह हमारे शरीर के आकार और रूप के लिए भी ज़िम्मेदार है। जैविक रूप से, यह द्रव और पृथ्वी का संयोजन है। कफ के अणु शरीर के जटिल अणु होते हैं जो कोशिकाओं में उत्तकों, ऊतकों के अंगों और जो पूरे शरीर में अंगों की स्थिरता को बनाये रखते है। जैविक रूप से, सभी कोशिकाएं और उत्तक आदि कफ दोष से बने है,  हालांकि, इसकी संरचना में तरल और ठोस तत्वों के भिन्न अनुपात हो सकते हैं।

कफ की रचना

कफ की रचनाजल (पानी / तरल पदार्थ) + पृथ्वी (पृथ्वी / ठोस)
हमारे शरीर में लगभग 50 से 70% पानी या तरल पदार्थ होते हैं। शरीर के पानी की  2/3 मात्रा कोशिकाओं के भीतर मौजूद इंट्रासेल्युलर तरल पदार्थ हैं। शरीर का एक तिहाई पानी कोशिकाओं के बाहर मौजूद कोशिकी द्रव है। यह द्रव शरीर और कफ में जल की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। शरीर के बड़े ढांचे जैसे हड्डियां, मांसपेशियां, अन्य अंगो के ठोस द्रव्य शरीर और कफ में पृथ्वी अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। कफ दोष के द्रव पित (Pitta Dosha) के लिए वाहन का काम करते है और वात (Vata Dosha) को नियंत्रण में रखते है।

कफ के कार्य, संक्षेप में-कफ दोष निम्नलिखित कार्य करता हैं:

  1. उपचय
  2. अवलंबन ​​और सामूहिकता
  3. स्नेहन – जोड़ों को स्नेहन जैसे
  4. गठन – शरीर के तरल पदार्थ और इंट्राव्हास्कुलर घटकों का निर्माण और रखरखाव
  5. शरीर के विकास और विकास
  6. शरीर की स्थिरता और दृढ़ता
  7. शक्ति
  8. रक्षा
कफ दोष एनोबोलिज़्म और जटिल अणुओं के गठन के लिए जिम्मेदार है, इसलिए यह पित के विपरीत काम करता है और इस के द्वारा पैदा की गयी अपचयता को जांचता है।
  • कफ शरीर का प्रमुख संघटन है। यह शरीर के मुख्य द्रव्यमान के लिए जिम्मेदार है।
  • सभी पोषक तत्व प्रमुखता से कफ दोष का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • शरीर में मौजूद तरल पदार्थ घर्षण प्रदान करते है और विभिन्न कोशिकाओं को पोषण प्रदान करता है
  • यह शरीर को ताकत देता है और शरीर में सभी मांसपेशियां कफ दोष का प्रतिनिधित्व करती हैं
  • यह प्रजनन क्षमता के लिए भी जिम्मेदार है
मुख्य कफ स्थान
कफ पूरे शरीर में मौजूद है और यह शरीर के पूरे द्रव्यमान के लिए ज़िम्मेदार है, लेकिन आयुर्वेद ने इसके कुछ प्रमुख स्थानों का वर्णन किया है जहां कफ दोष की मुख्य क्रियाएं देखी जा सकती हैं। कफ विकारों के इलाज के लिए आयुर्वेद में इस के कुछ चिकित्सीय महत्व हैं। दिल के ऊपर के सभी हिस्सों को कफ क्षेत्र माना जाता है।
  • सिर
  • गला
  • छाती
  • फेफड़े
  • संयोजी ऊतक
  • मोटे टिश्यू
  • स्नायुबंधन
  • लसीका
  • टेंडॉन्स

कफ के  उपप्रकार

कफ के पांच उपप्रकार हैं
  1. क्लेदक कफ
  2. अवलम्बक कफ
  3. बोधक कफ
  4. तर्पक कफ
  5. श्लेष्मक कफ

क्लेदक कफ

क्लेदक कफ पाचन नाली और उनमे होने वाला बलगम स्राव क्लेदक कफ दोष का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी प्रकृति चिपचिपी, मीठी, ठंडी और लसदार है।

स्थान

  • पेट
  • बृहदान्त्र से आंत

सामान्य कार्य

क्लेदक कफ  भोजन को गीला करता है और यह  खाने को छोटे कणों में  विभाजित करने में पाचक पित की मदद करता है। यह पाचन को सही रखता है और भोजन के मिलने में पित की सहायता करता है। यह पेट से पाचनांत्र तक भोजन को आगे करने में वात की सहायता करता है। उसके बाद भोजन को आंत और उसके बाद बृहदान्त्र तक पहुँचाने में भी यह मदद करता है। क्लेदक कफ दोष जठरांत्र प्रणाली को चिकनाई दे कर सहायता करता है।

इसके बढ़ने से होने वाले रोग

क्लेदक कफ का बढ़ना पाचन समस्यायों को बढ़ा सकता हे जैसे कड़ी मल के साथ कब्ज का होना।

अवलम्बक कफ

अवलम्बक कफ छाती में मौजूद होता है और फेफड़ों और दिल को पोषण प्रदान करता है। यह हृदय की मांसपेशियों और फेफड़ों के ऊतकों के गठन में अहम भूमिका निभाता है। यह कफ दोष का प्रतिनिधित्व करता है, जो अंतरीय द्रव और बलगम स्राव का गठन करता है, जो वायुकोष्ठिका के बीच घर्षण को चिकना बनाता है और रोकता है।

स्थान

छाती हृदय, फेफड़े के साथ और छाती के आसपास की सीरस झिल्ली और उसके बीच के स्थान आदि।

सामान्य कार्य

  • दिल और फेफड़ों के प्रारंभिक द्रव्यमान का गठन
  • चिकनाई और घर्षण को रोकने के लिए
  • पौष्टिक मायोकार्डियम और एलिवोलि
  • परिसंचरणऔर श्वसन में सहायक

 इसके बढ़ने से होने वाले रोग

  • दिल और फेफड़ों के रोग
  • आलस्य

बोधक कफ

बोधक कफ मुँह के छेद और गले में रहते हैं। लार इसका अच्छा उदहारण है। यह भोजन को गीला करता है और भोजन के कणों को घोलता है। जब यह स्वाद कलिकाओं के सम्पर्क में आता है तो यह भोजन के स्वाद को महसूस करने में मदद करता है।

स्थान

मुँह की कैविटी और गला

सामान्य कार्य

  • खाने को गीला करना और भोजन के कणों को घोलना
  • खाने के स्वाद को पहचाने में मदद करना

इसके बढ़ने से होने वाले रोग

  • कब्ज़ की शिकायत
  • स्वाद परिवर्तन

तर्पक कफ

सिर तर्पक कफ का मुख्य स्थान है। दिमाग की प्राथमिक द्रव्यमान इसके कारण है। इसे आगे अंदर के द्रव और मस्तिष्कमेरु द्रव्य द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।

स्थान

क्रेनियल गुहा तर्पक कफ का मुख्य स्थान है

सामान्य कार्य

  • कपाल गुहा और मस्तिष्क के मुख्य द्रव्यमान को बनाना
  • मस्तिष्क और अनुभव करने वाले अंगों को पोषण प्रदान करना
  • संवेदी और मोटर केंद्रों को उनका प्राकृतिक कार्यो की करने का समर्थन करना

इसके बढ़ने से होने वाले रोग

  • स्मरण शक्ति कम होना
  • इंद्रियों, मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के प्राकृतिक कार्यों में खराबी या गड़बड़

श्लेष्मक कफ

श्लेष्मक कफ मुख्य रूप से स्नेहन के लिए जिम्मेदार है। यह जोड़ों में मौजूद होता है और यह कफ जोड़ों में श्लेष्म द्रव का यह अच्छा उदाहरण है।

स्थान

शरीर के जोड़ श्लेष्मक कफ का मुख्य स्थान है।

सामान्य कार्य

  • जोड़ों और इसके आसपास की संरचनाओं को पोषण प्रदान करना
  • जोड़ों को चिकनाई करके हिलने के दौरान घर्षण को रोकना

इसके बढ़ने से होने वाले रोग

  • अस्थिसंधिशोथ
  • जोड़ों का दर्द
कफ चक्र
भोजन के पाचन से संबंधितभोजन के पचने से पहले (खाना खाने के बाद जब आप पेट को भरा हुआ महसूस करें और पूर्ण संतुष्टि हो)*
भोजन खाने का संबंधखाना खाने के बाद*
आयु का संबंधबचपन
सुबह से  संबंधसुबह लगभग 6AM से 10 AM तक
रात्रि से संबंधलगभग 6 PM से 10 PM तक
* हालांकि, पित ने अपना काम शुरू कर दिया है, लेकिन अभी भी कफ प्रमुख है।
कफ चक्र के अनुसार दवाईआं लेना
  • स्वाभाविक रूप से, कफ ऊपर की अवधि में प्रभावशाली है, जैसा कि ऊपर दी तालिका में चर्चा की गई है।
  • कफ दोष को शांत करने वाली दवाईआं भोजन करने के बाद लेनी चाहिए। यह तब दी जाती है जब आप पेट के भारीपन जैसी समस्या से पीड़ित हों।
  • कफ दोष को शांत करने वाली दवाईआं सुबह 6 AM से 10 AM और रात को लगभग 6 PM से  10 PM तक लेनी चाहिए।यह कफ विकारों पर लागू होता है।
कफ और मौसम
कफ का संचय (कफ छाया)सर्दियों का अंत (शिशिर)
कफ का अधिक बिगड़ना (कफ प्रकोप)वसंत ऋतू (वसंत )
बढ़ी हुई कफ का शमन (कफ प्रश्म)गर्मी (ग्रीष्म)
कफ के कम होने के लक्षण और स्वास्थ्य की स्थिति

  • त्वचा की शुष्कता बढ़ जाती है
  • मीठे स्वाद, तैलीय और भारी भोजन वाले पर्दार्थों को खाने की इच्छा
  • अधिक प्यास
  • पेरिस्टलसिस के हिलने में कमी और कब्ज का होना (वात उत्तेजना)
  • जोड़ों, मांसपेशियों और हड्डियों में कमजोरी महसूस करना
  • चक्कर
  • सामान्यकृत कमजोरी
बढे हुए कफ के लक्षण और स्वास्थ्य स्थितियां

  • अत्यधित थूक के साथ खांसी
  • छाती में रक्त संचय
  • फेफड़ों में संचित श्लेष्म के कारण सांस न आना
  • पीली, ठंडी और चिपचिपी त्वचा
  • अत्यधिक लार
  • आलस्य
  • उनींदापन
बहुत अधिक बिगड़े हुए कफ के लक्षण
  • मुँह में मीठा या नमकीन स्वाद
  • भारीपन के साथ त्वचा का कसा हुआ होना
  • त्वचा के ऊपर मोटे और गहरे पेस्ट के लगे होने का अनुभव होना
  • सूजन
  • सफेद रंग का मलिनकिरण
  • खारिश (खाज )
  • अधिक नींद
  • सुन्न होना और अकड़ना
कफ को संतुलित करने के उपाय :

इसके लिए सबसे पहले उन कारणों को दूर करना होगा जिनकी वजह से शरीर में कफ बढ़ गया है। कफ को संतुलित करने के लिए आपको अपने खानपान और जीवनशैली में ज़रूरी बदलाव करने होंगे। आइये सबसे पहले खानपान से जुड़े बदलावों के बारे में बात करते हैं।

कफ को संतुलित करने के लिए क्या खाएं :
  • कफ प्रकृति वाले लोगों को इन चीजों का सेवन करना ज्यादा फायदेमंद रहता है।
  • बाजरा, मक्का, गेंहूं, किनोवा ब्राउन राइस ,राई आदि अनाजों का सेवन करें।
  • सब्जियों में पालक, पत्तागोभी, ब्रोकली, हरी सेम, शिमला मिर्च, मटर, आलू, मूली, चुकंदर आदि का सेवन करें।
  • जैतून के तेल और सरसों के तेल का उपयोग करें।
  • छाछ और पनीर का सेवन करें।
  • तीखे और गर्म खाद्य पदार्थों का सेवन करें।
  • सभी तरह की दालों को अच्छे से पकाकर खाएं।
  • नमक का सेवन कम करें।
  • पुराने शहद का उचित मात्रा में सेवन करें।

कफ प्रकृति वाले लोगों को क्या नहीं खाना चाहिए :
  • मैदे और इससे बनी चीजों का सेवन ना करें।
  • एवोकैड़ो, खीरा, टमाटर, शकरकंद के सेवन से परहेज करें।
  • केला, खजूर, अंजीर, आम, तरबूज के सेवन से परहेज करें।


जीवनशैली में बदलाव :
  • खानपान में बदलाव के साथ साथ कफ को कम करने के लिए अपनी जीवनशैली में बदलाव लाना भी जरूरी है। आइये जाने हैं बढे हुए कफ दोष को कम करने के लिए क्या करना चाहिए।  
  • पाउडर से सूखी मालिश या तेल से शरीर की मसाज करें
  • गुनगुने पानी से नहायें।
  • रोजाना कुछ देर धूप में टहलें।
  • रोजाना व्यायाम करें जैसे कि : दौड़ना, ऊँची व लम्बी कूद, कुश्ती, तेजी से टहलना, तैरना आदि।  
  • गर्म कपड़ों का अधिक प्रयोग करें।
  • बहुत अधिक चिंता ना करें।
  • देर रात तक जागें
  • रोजाना की दिनचर्या में बदलाव लायें
  • ज्यादा आराम पसंद जिंदगी ना बिताएं बल्कि कुछ ना कुछ करते रहें।


कफ बहुत ज्यादा बढ़ जाने पर उल्टी करवाना सबसे ज्यादा फायदेमंद होता है। इसके लिए आयुर्वेदिक चिकित्सक द्वारा तीखे और गर्म प्रभाव वाले औषधियों की मदद से उल्टी कराई जाती है। असल में हमारे शरीर में कफ आमाशय और छाती में सबसे ज्यादा होता है, उल्टी (वमन क्रिया) करवाने से इन अंगों से कफ पूरी तरह बाहर निकल जाता है।

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